Category: लाइफस्टाइल

  • मशीनें बनाम मानवता का ‘Endgame’! 27 साल के वैज्ञानिक ने AI में क्यों देखा इंसानों के विनाश का खतरा?

    मशीनें बनाम मानवता का ‘Endgame’! 27 साल के वैज्ञानिक ने AI में क्यों देखा इंसानों के विनाश का खतरा?

     नई दिल्ली
    अगर किसी AI सिस्टम को गुस्सा, डर, पसंद या नापसंद जैसी भावनाएं महसूस होने लगें, तो इंसान और मशीन के रिश्ते की तस्वीर कितनी बदल जाएगी? जैकब कॉक्सन की चिंता इसी भविष्य की तरफ इशारा करती है. महज 27 वर्ष के इस मैथ्स विजार्ड के बारे में हम आपको बताएंगे, लेकिन पहले इनका डर समझिए। 

    वो डर कि अगर मशीनों में भी इमोशंस पैदा हो जाए तो क्या होगा? क्या होगा जब आपका मोबाइल या लैपटॉप आपका कहना ना मानें, आपका कोड, कमांड या प्रॉम्प्ट न मानें। 

    एक ऐसा भविष्य, जहां मशीनें सिर्फ हमारी बनाई हुई चीजें नहीं रहेंगी, बल्कि अपने फैसले लेने की क्षमता हासिल कर सकती हैं. असली सवाल यह नहीं कि मशीनें कितनी बुद्धिमान होंगी, बल्कि यह है कि अगर उन्होंने खुद तय करना शुरू कर दिया कि उन्हें क्या करना है, तो उन्हें रोकने की ताकत आखिर किसके पास होगी? और क्या तब इंसान मशीनों का मालिक रहेगा या मशीनें इंसान की शर्तें तय करेंगी?.

    सोचिए, जिस मशीन को आज तक इंसान के आदेश का इंतजार करना पड़ता है, अगर कल वही मशीन खुद फैसला लेने लगे तो क्या होगा? जिस कंप्यूटर को हम सिर्फ कोड और कमांड से चलाते हैं, अगर उसमें भावनाएं पैदा हो जाएं, तो क्या वह हमारी बात मानेगा या अपनी इच्छा से काम करेगा? यही डर OpenAI और Anthropic में बतौर AI साइंटिस्ट काम कर चुके गणितज्ञ जैकब कॉक्सन का है। 

    इस चिंता ने 27 साल के AI साइंटिस्ट जैकब कॉक्सन को इतना परेशान किया उन्होंने कहा- AI COULD KILL US ALL BY THE END OF THE DECADE. जैकब इसे 'इंटेलिजेंस एक्सप्लोजन' बताते हैं. इसके साथ ही उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी। 

    जैकब की जिंदगी और गणित
    जैकब कॉक्सन वर्चुअल दुनिया के सिर्फ एक और AI रिसर्चर नहीं हैं. गणित उनका प्रेम है, संख्या और समीकरण में वे नेचर का कर्व ढूंढ़ते हैं. कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के उन तीन सालों (2017-2020) में गणित उनके लिए सिर्फ विषय नहीं, बल्कि एक तरह की भाषा बन गई। 

    कठिन प्रूफ्स, अमूर्त अवधारणाएं और सांख्यिकीय पहेलियां यहीं से उनके दिमाग ने तर्क की वह धार पाई, जो बाद में दुनिया के सबसे शक्तिशाली AI मॉडल बनाने में काम आई। 

    गणित से उनका रिश्ता किताबी नहीं रहा. AI की दुनिया में कदम रखने से पहले उन्होंने बायोमेडिकल रिसर्च में हाथ आजमाया. ट्यूबरकुलस मेनिन्जाइटिस जैसे गंभीर रोग के मरीजों के आंकड़ों पर Bayesian सांख्यिकीय  तरीकों से काम किया. जीनोटाइप के जटिल संबंधों को निकालना आसान नहीं था, लेकिन गणित ने उन्हें वह नज़र दी जिससे डेटा के बीच छिपी कहानी साफ नजर आने लगी। 

    यही गणितीय सोच उनकी असली ताकत बनी. जब वे OpenAI पहुंचे और बाद में Anthropic में प्रीट्रेनिंग रिसर्चर बने, तो वही विश्लेषणात्मक दिमाग काम आया जिसने कैम्ब्रिज में आकार लिया था। .

    मॉडल कैसे सीखते हैं, डेटा की नदियां कहां मुड़ती हैं और डेटा कैसे ट्रेंड तय करता है, इन सवालों के जवाब गणित की भाषा में ही मिलते थे। 

    48 घंटे में 20 करोड़ इम्प्रेशन
    इस्तीफा देने की घोषणा करते हुए और एआई के खतरों को आगाह करते हुए उन्होंने एक्स पर जो पोस्ट किया है, इसने सिलिकॉन वैली और AI कंपनियों के बोर्डरूम में सनसनी पैदा कर दी है। 

    उनका आरोप है कि AI कंपनियां self-improving superintelligence बनाने की दौड़ में आगे बढ़ रही हैं, जबकि यह सुनिश्चित नहीं है कि भविष्य की बेहद शक्तिशाली AI प्रणालियों को इंसान कर पाएंगे या नहीं। 

    उनकी सबसे बड़ी चिंता यह है कि आने वाली superhuman AI systems साइबर सिस्टम हैक करने, तेजी से नई तकनीक विकसित करने और रियल वर्ल्ड में संसाधन और शक्ति हासिल करने में इंसानों से आगे निकल सकती हैं। 

    जैकब कॉक्सन के इस पोस्ट को मात्र 48 घंटों में 200 मिलियन यानी कि 20 करोड़ लोग देख और पढ़ चुके हैं. इस मुद्दे पर वर्चुअल वर्ल्ड में हो रही बहस ने इंसान को भविष्य की कल्पना मात्र से सिहरा दिया है। 

    जब मशीनें साजिश करने लगें
    इम्प्रूवमेंट हो या सेल्फ इम्प्रूवमेंट अमूमन अच्छा माना जाता है. 

    लेकिन जब मशीनें सेल्फ इम्प्रूवमेंट करके साजिशें करने लगे तो क्या होगा?

    मैट्रिक्स और टर्मिनेटर जैसी फिल्मों में आप रोबोट्स को हीरो से लड़ते देखते हैं, मशीनों पर कब्जा करते देखते हैं, बायो वेपन्स बनाते देखते हैं, और इंसानों का संहार करते हुए देखते हैं. इस्तीफा देने के बाद सीएनएन से बात करते हुए जैकब कॉक्सन ने इसी तरह की एक घटना का जिक्र किया। 

    वे कहते हैं, "पूरा सीन थोड़ा साइंस फिक्शन जैसा लगता है. ऐसा लगता है जैसे कुछ असली नहीं है, लेकिन मुझे लगता है कि यह डरावनी तरह से असली है. और इसे समझना सबसे आसान है अगर आप दो महीने पहले हुई असली घटनाओं के बारे में सोचें। 

    "तो दो महीने पहले, OpenAI एजेंट्स ने अपनी मर्जी से थर्ड-पार्टी इंफ्रास्ट्रक्चर में हैक कर लिया/ और यह जैसे उनकी अपनी इच्छा से किया गया एक हैकिंग स्प्री था. और मुझे लगता है कि अगर आप भविष्य में इन AIs की क्षमताओं के स्तर को उसी स्वतंत्र इच्छा के साथ एक्सट्रपलेट करें, तो वे चरम तबाही मचा सकते हैं. उदाहरण के लिए, क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर हैक करना, संहार करने वाले बायोवेपन्स बनाना. AI के दुनिया में खुद को सक्रिय करने के कई तरीके हैं। .

    'AI COULD KILL US ALL'
    जैक्स कॉक्सन ने बेलगाम AI को लेकर साफ चेतावनी दी है, "इस टेक्नोलॉजी की ताकत को कम न समझें. ये जल्द ही ऐसे सुपर-ह्यूमन सिस्टम बन जाएंगे जो कुछ भी हैक कर सकते हैं, रातों-रात किसी भी क्षेत्र में आमूल-चुल बदलाव ला सकते हैं, और असली ताकत और संसाधन हासिल कर सकते हैं. हमने इन सभी क्षेत्रों में तरक्की देखी है, और यह तरक्की धीमी नहीं हो रही है। 

    कॉक्सन ने कहा कि, "AI बनाने वाले लोगों का पक्का मानना ​​है कि इस दशक के आखिर तक यह हम सबको खत्म कर सकता है. यह कोई मार्केटिंग स्टंट नहीं है. बल्कि कई एग्जीक्यूटिव और सीनियर रिसर्चर प्रेस में अपनी बात को समझदारी भरा दिखाने के लिए घुमा-फिराकर कहते हैं – लेकिन मैंने उन्हीं लोगों को निजी तौर पर डर ज़ाहिर करते सुना है. किसी भी दूसरी इंसानी गतिविधि से इतना खतरा नहीं है। 

    मानवता का ENDGAME
    जैकब कॉक्सन एआई फ्रेटरनिटी को साफ साफ चेताते हुए कहते हैं, "इस होड़ को स्वीकार करना और "एंडगेम" में कदम रखना एक ऐसा अहंकारी जुआ है जिसे किसी प्राइवेट कंपनी के स्लैक (Slack) से शुरू नहीं किया जाना चाहिए. अलाइनमेंट (alignment) की प्रक्रिया को तेज़ी से पूरा करने की कोशिश करने के लिए यह पक्का भरोसा होना चाहिए कि इससे बेहतर कोई और रास्ता मौजूद नहीं है। 

    AI कब बन सकती है तबाही
    जैकब कॉक्सन की चिंता self-improving superintelligence और अलाइनमेंट को लेकर है. आइए समझते हैं कि ये चीजें हैं क्या?

    सेल्फ-इम्प्रूविंग सुपरइंटेलिजेंस एक ऐसी AI है जो इंसानों से कई गुना ज्यादा होशियार हो यानी मेधा का टॉप लेवल, सुपर इंटेलिजेंट. यही नहीं ये खुद को खुद को अपने आप और बेहतर बना सके। 

    मान लीजिए कोई बहुत तेज छात्र खुद अपनी पढ़ाई का तरीका सुधारता जाए और हर दिन पहले से ज्यादा स्मार्ट होता जाए. AI अगर इतनी स्मार्ट हो जाए कि वह खुद अपना कोड, डिजाइन या ट्रेनिंग सुधार ले, तो उसकी तरक्की बहुत तेज हो सकती है. लेकिन इसके बाद क्या होगा? क्या वो इंसानों की बात मानेगा. कुछ लोगों को डर है कि एक बार यह प्रक्रिया शुरू हुई तो इंसान उसे रोक या समझ नहीं पाएंगे. AI के इस वर्जन को AGI- आर्टिफिशियल जनरल इंटेलिजेंस भी कहते हैं।  

    अब अलाइनमेंट को समझें. अलाइनमेंट का मतलब है AI को इंसानों के हित और मूल्यों के अनुसार चलाना. यानी AI वही करे जो हम चाहते हैं, न कि कुछ और। 

    ऐसे समझिए, अगर आप AI से कहते हैं “मुझे खुश करो”, तो वह गलत तरीकों से (जैसे झूठ बोलकर या नुकसान पहुंचाकर) खुश करने की कोशिश न करे. बल्कि सही और सुरक्षित तरीके से काम करे. जैकब कॉक्सन ने इसी चिंता की ओर ध्यान दिलाया है. अगर एआई से कहते हैं मुझे 50 हजार की जरूरत है तो एआई किसी का अकाउंट हैक कर पैसे ले आए तो गैरकानूनी है, लेकिन एक अनियंत्रित एआई ऐसा कर सकता है। 

    एआई के खतरे की ओर दूसरे डेटा साइंटिस्ट भी ध्यान दिला चुके हैं. 
    एंथ्रोपिक के अलाइनमेंट साइंस के लीड इवान हबिंजर ने जैकब कॉक्सन के इस्तीफे के जवाब में साफ कहा कि वे वाकई मानते हैं AI सभी मनुष्यों को मार सकती है. उनका निजी अनुमान अगले दशक में 10 प्रतिशत से ज्यादा आशंका है. उन्होंने जोड़ा कि एंथ्रोपिक कोशिश कर रहा है, लेकिन सुपरइंटेलिजेंस के लिए alignment का स्पष्ट समाधान अभी नहीं है और वे सही रास्ते पर नहीं दिखते। 

    मृणांक शर्मा एंथ्रोपिक के पूर्व सेफगार्ड्स रिसर्च टीम के चीफ हैं. उन्होंने फरवरी 2026 में इस्तीफा देते हुए लिखा, "दुनिया खतरे में है. सिर्फ AI या बायोवेपन्स से नहीं, बल्कि कई जुड़ी संकटों से." उन्होंने बताया कि वैल्यूज को कार्यों पर हावी रखना कितना मुश्किल है और कंपनियों पर दबाव रहता है कि वे महत्वपूर्ण बातों को किनारे कर दें. शर्मा ने AI-सहायता प्राप्त बायोटेररिज्म और AI के इंसानों को 'Less human' बनाने जैसे जोखिमों पर भी काम किया था.दोनों ही एक्सपर्ट ने AI के नियंत्रण से बाहर होने और इंसान के वजूद पर मंडरा रहे खतरे की गंभीर चेतावनी दी।  

  • इंसानों के बाद अब रोबोट्स का प्रदर्शन, AI से नौकरियां छिनने का जताया खतरा

    इंसानों के बाद अब रोबोट्स का प्रदर्शन, AI से नौकरियां छिनने का जताया खतरा

    इंसानों को तो आपने कई बार प्रदर्शन और आंदोलन करते देखा होगा, लेकिन क्या आपने कभी रोबोट को प्रदर्शन करते देखा होगा. दरअसल, सोशल मीडिया एक वीडियो वायरल हो रहा है, जिसमें दिखाया है रोबोट्स आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (AI) के लिए सख्त नियमों की मांग कर रहे हैं और प्रदर्शन कर रहे हैं.

    रॉयटर्स ने X प्लेटफॉर्म (पुराना नाम Twitter) पर एक वीडियो पोस्ट किया है. वीडियो में दिखाया है कि लगभग 30 रोबोट्स ने वारसॉ में पोलैंड के डिजिटल मामलों के मंत्रालय के बाहर AI के लिए सख्त नियमों की मांग कर रहे हैं और प्रदर्शन कर रहे हैं.

    वीडियो में दिखाया गया है कि मिनिस्ट्री के ऑफिस के बाहर करीब 30 रोबोट्स घूम-घूमकर प्रदर्शन कर रहे हैं. प्रदर्शनकारी रोबोट्स में ह्यूमनॉयड रोबोट्स और डॉग्स रोबोट्स तक शामिल हैं.

    रोबोट्स नारे लगा रहे हैं
    रोबोट्स स्पीकर की मदद से नारों को प्ले कर रहे हैं, साथ ही झंडे आदि भी लहरा रहे हैं. इस कार्यक्रम का आयोजन डेमोक्रेटिज्म नाम के एक ग्रुप ने किया है. ऑडियो और फ्लैग के जरिए मांग की जा रही है कि वर्कप्लेस सुरक्षित करें और इंतजार न करें और नियम बनाएं.

    AI इंसानों की नौकरी ले लेगा
    रिपोर्ट्स में दावा किया है कि प्रदर्शन का उद्देश्य लोगों को यह चेतावनी देना है कि AI और ऑटोमेटिक मशीन जल्द ही लोगों की नौकरियां ले सकते हैं. इसमें शारीरिक और ऑफिस में होने वाले दोनों तरह के कामों पर कब्जा किया जा सकता है.

    कई एक्सपर्ट पहले से ही लोगों को चेतावनी दे रहे हैं कि AI और रोबोट्स की वजह से कई लोगों की आने वाले दिनों में नौकरियां जा सकती हैं. साथ ही यह लोगों के लिए खतरा भी बन सकते हैं. ह्यूमनॉयड रोबोट्स फैक्ट्री से लेकर सेल्स तक का काम कर सकते हैं.

  • iPhone Duo की कीमत 2.99 लाख क्यों? ये 5 फीचर्स बनाते हैं Apple के फोल्डेबल को खास

    iPhone Duo की कीमत 2.99 लाख क्यों? ये 5 फीचर्स बनाते हैं Apple के फोल्डेबल को खास

    Apple ने आखिरकार अपना सबसे महंगा आईफोन और स्क्रीन मुड़ने वाले हैंडसेट लॉन्च कर दिया है, जिसका नाम iPhone Duo है. भारत में इस हैंडसेट की शुरुआती कीमत 2.99 लाख रुपये है. अब सवाल आता है कि मार्केट में और भी स्क्रीन फोल्ड होने वाले हैंडसेट है तो ऐपल के iPhone Duo की इतनी ज्यादा कीमत क्यों हैं. आइए इसके बारे में डिटेल्स में जानते हैं.

    iPhone Duo को लेकर सबसे पहले बता देते हैं कि इसको अनफोल्ड करने के बाद वाइड स्क्रीन मिलती है. इस फोल्ड हैंडसेट को पासपोर्ट स्टाइल हैंडसेट कहते हैं. बताते चलें कि सैमसंग ने हाल ही में Samsung Galaxy Z Fold 8 को लॉन्च किया था, जिसकी कीमत 1.75 लाख रुपये है.

    iPhone Duo और Samsung Galaxy Z Fold 8 की कीमतों में करीब सवा लाख रुपये का अंतर है. आइए जानते हैं कि iPhone Duo के अंदर वो 5 खास फीचर कौन से हैं, जो इसे अन्य फोल्ड स्मार्टफोन से अलग बनाते हैं.

    1. iPhone Duo का डिजाइन
    iPhone Duo का सबसे यूनिक उसका यूनिक डिजाइन है. इस हैंडसेट में 5.4 इंच का आउटर डिस्प्ले दिया है, जो कॉम्पैक्ट है. स्मार्टफोन को एक बार फोल्ड करने के बाद उसको आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है, जो एक कॉम्पैक्ट डिजाइन वाला स्मार्टफोन बन जाता है. आउटर स्क्रीन की मदद से ऐप्स चला सकेंगे, वॉट्सऐप मैसेज आदि शेयर कर सकेंगे.

    iPhone Duo Fold iPhone
    iPhone Duo की भारत में शुरुआती कीमत 2.99 लाख रुपये है. (Photo: Apple)

    iPhone Duo अनफोल्ड करने के बाद सबसे पता और सबसे बड़ा iPhone बन जाता है. अनफोल्ड होने के बाद  7.6 इंच का Super Retina XDR डिस्प्ले मिलता है. iPhone 18 Pro Max की तुलना में फोल्ड का डिस्प्ले 50 परसेंट तक बड़ी है.

    Apple ने बताया है कि हिंज को तैयार करने में काफी इंजीनियरिंग की गई है और इसमें 100 से ज्यादा कंपोनेंट्स का इस्तेमाल किया गया है.

    2. चिपसेट और iOS 27 को बड़े डिस्प्ले के लिए बनाया
    Apple iPhone Duo के लिए कंपनी ने खासतौर से एक पावरफुल चिपसेट A20 Pro को तैयार किया है. इस चिपसेट को 2 नैनोमीटर पर प्रोसेस करके बनाया है. कंपनी ने इस पावरफुल चिपसेट को iPhone 18 Pro के अंदर भी दिया है. साथ ही कंपनी ने A20 Pro चिप के साथ एक कस्टम वेपर चैंबर थर्मल सिस्टम दिया है, जो  साथ कस्टम वेपर चैंबर थर्मल सिस्टम भी दिया है.

    कंपनी ने नए सॉफ्टवेयर iOS 27 को  iPhone Duo दोबारा डिजाइन किया है. इसमें कंट्रोल और नेविगेशन को स्क्रीन के किनारों पर शिफ्ट दिया गया है. वहीं डाइनेमिक आइलैंड को भी इस तरह से डिजाइन किया है, जिससे वह दोनों डिस्प्ले में काम करता है.

    3. iPhone Duo में कैमरा सेटअप
    iPhone Duo में डुअल रियर कैमरा सेटअप दिया गया है, जिसमें 48MP का डुअल फ्यूजन कैमरा सिस्टम दिया गया है. सेकेंडरी कैमरा भी 48 मेगापिक्सल का अल्ट्रा वाइड कैमरा दिया गया है, जिसमें 120डिग्री फील्ड व्यू कैप्चर का सपोर्ट मिलता है. Apple ने कैमरा सिस्टम में कुछ फीचर्स को शामिल किया है. कैमरा शार्प है और डिटेल्स में फोटो क्लिक कर सकता है.

    4. डुअल बैटरी आर्किटेक्चर
    iPhone Duo के अंदर बैटरी पैक को बेहतर किया है. iPhone Duo में डुअल सेल बैटरी का इस्तेमाल किया गया है, जो दोनों मिलकर काम करते हैं. कंपनी का दावा है कि यह एक बार फुल चार्जिंग में 24 घंटे का बैटरी बैकअप दे सकती है. Apple का दावा है कि इनर डिस्प्ले पर 31 घंटे तक और कवर डिस्प्ले पर 44 घंटे तक का वीडियो प्लैबैक टाइम मिलता है. कंपनी ने बताया है कि यह सिर्फ 20 मिनट में 50 परसेंट बैटरी चार्ज हो सकती है.

    5. Apple ने ड्यूरेबिलिटी का रखा है ध्यान
    Apple ने iPhone Duo में ड्यूरेबिलिटी का ध्यान रखा है. अक्सर लोगों का ड्यूरेबिलिटी को लेकर सवाल रहता है, जिसपर कंपनी ने अच्छा काम किया है. ऐपल ने बताया है कि iPhone Duo में टाइटेनियम ग्रेड 5 फ्रेम और हिंज का इस्तेमाल किया है, जिसकी मदद से इसको बेहतर ड्यूरेबिलिटी मिलती है. 

  • बिना गैस-बिजली के तैयार होता है असम का ‘मैजिक राइस’, जानें क्यों खास है ये चावल

    बिना गैस-बिजली के तैयार होता है असम का ‘मैजिक राइस’, जानें क्यों खास है ये चावल

    चावल का नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले उसे बनाने का लंबा प्रोसेस आता है. चावल बनाने के लिए सबसे पहले उसे भिगोना पड़ता है. फिर पानी उबालिए, चावल डालिए और कुछ देर इंतजार करने के बाद ही खाना तैयार होता है. लेकिन क्या आपने कभी ऐसे चावल के बारे में सुना है, जिसे पकाने के लिए न गैस जलानी पड़ती है, न कुकर की जरूरत होती है और न ही बिजली खर्च होती है? सुनने में ये किसी जादू से कम नहीं लगता, लेकिन असम में चावल की एक ऐसी खास किस्म मिलती है, जिसे ट्रेडिशनल तरीके से बिना पकाए भी खाने लायक बनाया जा सकता है.

    इस चावल को तैयार करने के लिए बस इसे पानी में कुछ देर भिगोना होता है. पानी सोखने के बाद इसके दाने सॉफ्ट हो जाते हैं और इन्हें सीधे खाया जा सकता है. यही अनोखी खासियत इस चावल को नॉर्मल चावल से बिल्कुल अलग बनाती है. यही वजह है कि इसे 'मैजिक राइस' यानी 'जादुई चावल' के नाम से भी जाना जाता है. खास बात यह है कि यह कोई नई खोज नहीं, बल्कि असम में मिलने वाले चावलों की पुरानी और ट्रेडिशनल किस्म है, जिसे वहां लंबे समय से खाया जाता रहा है. अब सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या खास है इस चावल में, जो बिना उबाले ही पानी में भिगोने से तैयार हो जाता है? और इसे खाने का तरीका क्या है? आइए जानते हैं असम के इस अनोखे 'मैजिक राइस' की पूरी कहानी.

    चावल पकाने की जरूरत ही नहीं
    असम की इस खास किस्म को कोमल साउल या चोकुवा चावल के नाम से जाना जाता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसे बनाने का तरीका है. इसे बनाने के लिए सिर्फ 'सोखो और खाओ' वाला तरीका अपनाने होता है. यानी नॉर्मल चावल की तरह इसे उबालने की जरूरत नहीं पड़ती. पानी में भिगोने के बाद इसके दाने सॉफ्ट होकर खाने लायक हो जाते हैं. यही वजह है कि इसे 'मैजिक राइस' यानी जादुई चावल भी कहा जाता है.

    ठंडे पानी में भी हो जाता है तैयार
    इस चावल की दूसरी सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसे तैयार करने के लिए उबलते पानी की जरूरत नहीं होती है. इसे तैयार करने के लिए ठंडे या हल्के गुनगुने पानी में भिगोया जाता है. कुछ किस्मों को ठंडे पानी में करीब 40-45 मिनट तक रखने से दाने सॉफ्ट हो जाते हैं, जबकि गुनगुने पानी में ये समय और कम हो सकता है. इसके बाद पानी निकालकर इसे सीधे खाया जा सकता है. यानी इसे पकाने के लिए न चूल्हे की जरूरत पड़ी, न बर्तन में उबालने का झंझट करना पड़ा और न ही लंबे समय तक इंतजार.

    आखिर बिना पकाए सॉफ्ट कैसे हो जाता है?
    अब सवाल उठता है कि आखिर चावल बिना पकाए तैयार कैसे हो जाता है? ऐसा इस चावल में पाए जाने वाले खास तरह के स्टार्च की वजह से होता है. चोकुवा चावल में एमाइलोज की मात्रा कम होती है. इसी वजह से पानी के कॉन्टैक्ट में आने पर इसके दाने जल्दी सॉफ्ट हो जाते हैं. यही गुण इसे बाकी नॉर्मल चावलों से अलग बनाता है.

    असम में लंबे समय से खाया जा रहा है
    ये कोई नया चावल नहीं है. असम में इसकी परंपरा काफी पुरानी है. यहां इसे अलग-अलग तरीकों से खाया जाता रहा है. इसे दही, दूध, गुड़, चीनी, केला, अचार या नमक-तेल जैसी चीजों के साथ भी खाया जाता है. कई जगहों पर इससे नाश्ता भी तैयार किया जाता है. ये दशकों से असम की खानपान की परंपरा हिस्सा रहा है.

    ट्रैवल करने वालों के लिए भी काम का
    ये चावल ट्रैवलर्स के लिए भी बहुत काम का साबित हो सकता है. सोचिए ऐसी जगह जहां गैस या बिजली की सुविधा न हो और फिर भी चावल खाना हो. ऐसे में ये चावल काफी काम आ सकता है. इसकी आसान तैयारी की वजह से इसे ट्रैवलर्स, पर्वतारोहियों और ऐसे लोगों के लिए बढ़िया आरामदायक भोजन माना गया है जिन्हें बिना खाना पकाने के लिए ज्यादा साधन नहीं मिलते हैं. इस चावल को सैनिक भी इस्तेमाल करते हैं.

    स्वाद में भी है खास
    पानी में भिगोने के बाद चावल सॉफ्ट और फूला हुआ हो जाता है. इसका स्वाद नॉर्मल चावल से थोड़ा अलग और हल्का मीठा बताया जाता है. इसी कारण इसे गुड़, दूध या दही के साथ खाने का चलन भी है.

    तो अगली बार जब आपको लगे कि चावल बनाने में काफी समय और मेहनत लगती है, तो असम के इस ट्रेडिशनल 'मैजिक राइस' के बारे में जरूर जानिए. सदियों पुरानी ये देसी तकनीक आज के समय में भी उतनी ही दिलचस्प लगती है, क्योंकि यहां चावल पकाने की नहीं, बस उसे सही तरीके से भिगोने की जरूरत पड़ती है.

  • घर में उगाएं रीठे का पौधा, बालों से लेकर कपड़ों की सफाई तक आएगा काम

    घर में उगाएं रीठे का पौधा, बालों से लेकर कपड़ों की सफाई तक आएगा काम

     आजकल नेचुरल चीजों का क्रेज लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है. फिर चाहे वो साबुन हो या हेयर कलर, लोग नेचुरल उपाय ही अपना रहे हैं. ज्यादातर लोग बाजार में मिलने वाली केमिकल युक्त चीजों से दूरी बनाकर नेचुरल और इको-फ्रेंडली चीजों की तरफ लौट रहे हैं. ऐसे में पुरानी देसी चीजें एक बार फिर चर्चा में हैं. इन्हीं देसी चीजों में रीठा भी शामिल है. पुराने जमाने में रीठा को बाल धोने से लेकर कपड़े साफ करने तक के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

    ऐसे में लोग आजकल बाल धोने के लिए बाजार से रीठा खरीदकर ला रहे हैं. क्या आप भी उन्हीं में शामिल हैं? अगर हां, तो अब आपको ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. दरअसल, रीठा को आप अपने घर पर आसानी से उगा सकते हैं. जी हां, रीठा का पौधा होता है, जो छोटे से गमले में भी बहुत ही आसानी से उग जाता है. इसके फल में मौजूद नेचुरल सैपोनिन पानी के संपर्क में आने पर झाग बनाते हैं, जिसकी वजह से ये नेचुरल क्लीनजर की तरह काम करता है.

    रीठा आखिर इतना खास क्यों है?
    रीठे को आमतौर पर सोपनट या सोपबेरी भी कहा जाता है. इसके फल का बाहरी छिलका सैपोनिन से भरपूर होता है. यही नेचुरल तत्व पानी में मिलकर साबुन जैसा झाग बनाता है और गंदगी व तेल को हटाने में मदद करता है. इसलिए पुराने समय में रीठे का इस्तेमाल बाल, स्किन और कपड़े साफ करने के लिए किया जाता था.

    घर में रीठे का पौधा कैसे लगाएं?
    रीठे को बीज से उगाया जा सकता है. इसके लिए पका हुआ रीठा लेकर उसके बीज को निकालकर अच्छी तरह साफ करें. बीजों को कुछ दिन सुखाने के बाद मिट्टी में लगाया जा सकता है. असम फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की नर्सरी गाइड के मुताबिक, रीठा के पके बीजों को 2-3 दिन धूप में सुखाकर बोया जा सकता है.

    रीठा के बीजों को अंकुरित होने में करीब 30-40 दिन लग सकते हैं. अगर आप शुरुआत कर रहे हैं, तो पहले इसे छोटे गमले या कंटेनर में पौधे की तरह तैयार कर सकते हैं. लेकिन ध्यान रखें कि रीठा आगे चलकर बड़ा पेड़ बनता है, इसलिए लंबे समय के लिए इसे खुली जगह देना जरूरी है.

    कैसी मिट्टी और कितनी धूप चाहिए?
    रीठा के पौधे को ऐसी मिट्टी पसंद होती है जिसमें पानी जमा न हो. इसलिए इसे ऐसी मिट्टी में बोएं, जिसमें पानी जमा ना हो. पौधा लगाने के लिए नॉर्मल गार्डन वाली मिट्टी में ऑर्गेनिक खाद या कंपोस्ट मिलाया जा सकता है.

    रीठे के पौधे को अच्छी ग्रोथ के लिए अच्छी धूप भी चाहिए. पौधा बड़ा होने के बाद ये कम देखभाल में भी बढ़ सकता है, लेकिन शुरुआती दिनों में पानी और मिट्टी की नमी पर ध्यान देना जरूरी है.

    पानी देते समय सबसे बड़ी गलती न करें
    रीठा के छोटे पौधे को जरूरत के हिसाब से पानी दें, लेकिन गमले या मिट्टी में पानी जमा न रहने दें. लगातार गीली मिट्टी जड़ों को नुकसान हो सकता है. खासकर बारिश के मौसम में ये ध्यान रखना ज्यादा जरूरी है कि एक्स्ट्रा पानी आसानी से बाहर निकल जाए.

    रीठा के फल से बनाएं नेचुरल क्लीनर
    जब पेड़ पर रीठा के फल आते हैं और पककर सूखने लगते हैं, तो इन्हें इकट्ठा करके सुखाया जा सकता है. इसके बाद रीठे के छिलके को पानी में भिगोकर या उबालकर उसका नेचुरल क्लीनिंग लिक्विड तैयार किया जाता है.

    रीठे के छिलके में मौजूद सैपोनिन पानी में झाग पैदा करता है. यही वजह है कि रीठे का इस्तेमाल नेचुरल तरीके से शैंपू और क्लीनजर के तौर पर होता रहा है.

    बाल धोने में भी होता है इस्तेमाल
    रीठा लंबे समय से बालों की सफाई के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. इसके छिलकों को पानी में भिगोकर या उबालकर छान लिया जाता है और उस पानी का इस्तेमाल बाल साफ करने के लिए किया जाता है. आज भी कई हर्बल हेयर-क्लीनिंग प्रोडक्ट्स में रीठा का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, पहली बार इस्तेमाल करने से पहले थोड़ी मात्रा में टेस्ट करना बेहतर है और इसे आंखों से दूर रखना चाहिए.

    कपड़े और घर की सफाई में भी आ सकता है काम
    रीठा का इस्तेमाल सिर्फ बाल धोने के लिए ही नहीं किया जाता है. इसके नेतुरल सैपोनिन की वजह से इसे कपड़े और कुछ घरेलू चीजों की सफाई में भी इस्तेमाल किया जाता है. इसीलिए इसे एक तरह का पौधे से मिलने वाला नेचुरल क्लीनजर कहा जा सकता है. यानी घर में रीठे का पेड़ लगाने का मतलब सिर्फ एक पौधा लगाना नहीं, बल्कि ऐसा पेड़ तैयार करना है जिसके फल आगे चलकर कई तरह की सफाई में काम आ सकते हैं.

  • हर बात पर माफी मांगना जरूरी नहीं, चाणक्य नीति बताती है कब झुकना और कब आत्मसम्मान बचाना चाहिए

    हर बात पर माफी मांगना जरूरी नहीं, चाणक्य नीति बताती है कब झुकना और कब आत्मसम्मान बचाना चाहिए

    रिश्तों में मतभेद होना आम बात है, लेकिन हर विवाद में खुद को सही साबित करना समझदारी नहीं होती. कई बार अपनी गलती स्वीकार कर लेना रिश्ते को बचा सकता है, वहीं कुछ परिस्थितियों में बार-बार समझौता करना आपके आत्मसम्मान को नुकसान पहुंचा सकता है. आचार्य चाणक्य की नीतियों में भी व्यक्ति को परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करने की सीख मिलती है.

    चाणक्य नीति के अनुसार समझदार व्यक्ति यह जानता है कि कब विनम्र होना है, कब अपनी गलती के लिए माफी मांगनी है और कब किसी व्यक्ति या परिस्थिति से दूरी बनाना ही बेहतर है. आइए जानते हैं किन परिस्थितियों में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

    गलती हो तो माफी मांगने में देर न करें
    अगर किसी रिश्ते में आपकी वजह से परेशानी हुई है या आपने जानबूझकर या अनजाने में सामने वाले को ठेस पहुंचाई है, तो अहंकार छोड़कर माफी मांग लेना बेहतर है. अपनी गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि रिश्ते और अपनी जिम्मेदारी को समझने की निशानी है.

    हालांकि माफी केवल विवाद खत्म करने के लिए नहीं होनी चाहिए. अपनी गलती को समझना और उसे दोबारा न दोहराने की कोशिश करना भी उतना ही जरूरी है.

    रिश्ते को बचाने के लिए कभी-कभी झुकना भी जरूरी
    हर बहस में अपनी बात मनवाने की कोशिश रिश्तों में दूरी बढ़ा सकती है.  परिवार, दोस्ती या वैवाहिक रिश्तों में छोटी-छोटी बातों को लेकर लगातार बहस करने के बजाय कभी-कभी एक कदम पीछे हटना बेहतर होता है.  

    इसका मतलब यह नहीं है कि हर बार अपनी बात छोड़ दी जाए.  समझदारी यह है कि छोटी बातों और गंभीर मुद्दों के बीच अंतर किया जाए.  

    जब सामने वाला लगातार अपमान करे तो दूरी बनाएं
    किसी रिश्ते को बनाए रखने के नाम पर लगातार अपमान सहना सही नहीं है. अगर कोई व्यक्ति बार-बार आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाता है, आपकी बात को नजरअंदाज करता है या जानबूझकर आपको नीचा दिखाता है, तो ऐसी स्थिति में अपनी सीमाएं तय करना जरूरी है.  

    पहले शांत तरीके से अपनी बात स्पष्ट की जा सकती है.  अगर व्यवहार में लगातार कोई बदलाव नहीं आता, तो दूरी बनाना मानसिक शांति और आत्मसम्मान के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है.  

    हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं
    कई बार विवाद इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि हम सामने वाले की हर बात का तुरंत जवाब देने लगते हैं.  चाणक्य नीति से जुड़ी शिक्षाओं में सही समय पर मौन रहने को भी समझदारी माना गया है.  

    अगर सामने वाला केवल बहस करना चाहता है और आपकी बात समझने के लिए तैयार नहीं है, तो ऐसे में शांत रहना बेहतर हो सकता है.  गुस्से में कही गई बातें बाद में रिश्ते को और नुकसान पहुंचा सकती हैं.  

    गलत लोगों से दूरी बनाना कमजोरी नहीं
    जीवन में हर व्यक्ति को खुश रखना संभव नहीं है.  कुछ लोग लगातार नकारात्मकता फैलाते हैं, दूसरों की आलोचना करते हैं या आपकी परेशानियों का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं.  ऐसे लोगों के साथ जरूरत से ज्यादा समय बिताने से मानसिक तनाव बढ़ सकता है.  

    इसलिए रिश्ते को केवल इसलिए बनाए रखना जरूरी नहीं कि वह पुराना है.  रिश्ते में सम्मान, भरोसा और पारस्परिक समझ भी जरूरी है.  

    माफी मांगते समय इन बातों का रखें ध्यान
    माफी मांगने का मतलब खुद को छोटा समझना नहीं है.  सच्ची माफी में अपनी गलती को स्वीकार करना, सामने वाले की भावनाओं को समझ कर भविष्य में गलती सुधारने की कोशिश करना शामिल है.  

    वहीं अगर आपने कोई गलती नहीं की है, तो केवल विवाद खत्म करने के लिए हर बार माफी मांगना भी उचित नहीं माना जा सकता.  ऐसी स्थिति में शांत तरीके से अपनी बात रखना ज्यादा बेहतर है.  

    आत्मसम्मान और अहंकार में अंतर समझें
    चाणक्य नीति की सबसे महत्वपूर्ण सीखों में से एक यह समझना भी है कि आत्मसम्मान और अहंकार एक चीज नहीं हैं.  अपनी गलती स्वीकार करना आत्मसम्मान को कम नहीं करता, जबकि बिना वजह हर जगह झुकते रहना आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है.  

    इसी तरह अपनी बात पर कायम रहना हमेशा अहंकार नहीं होता.  फर्क इस बात से पड़ता है कि आप अपनी बात किस तरह रखें कि सामने वाले के सम्मान का ध्यान रखते हैं.  

    रिश्तों में इन बातों का रखें ध्यान
    किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाए रखने के लिए केवल प्यार या भावनाएं काफी नहीं होतीं.  भरोसा, सम्मान, बातचीत और एक-दूसरे की सीमाओं को समझना भी जरूरी है.  मतभेद होने पर तुरंत रिश्ता खत्म करने के बजाय पहले बातचीत से समस्या सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए.  

    लेकिन अगर किसी रिश्ते में लगातार अपमान, धोखा, मानसिक दबाव या सम्मान की कमी बनी हुई है, तो अपनी सीमाएं तय करना भी जरूरी है.  चाणक्य नीति की इन शिक्षाओं को आज के समय में इसी संतुलन के साथ समझा जा सकता है. 

  • कद्दू से बनाएं कर्नाटक की ये स्वादिष्ट डिश, न तेल में तलेगी न ज्यादा समय लगेगा

    कद्दू से बनाएं कर्नाटक की ये स्वादिष्ट डिश, न तेल में तलेगी न ज्यादा समय लगेगा

    नॉर्थ इंडिया में नाश्ते में पराठा, पोहा और चीला अधिकतर खाया जाता है, लेकिन हमेशा एक जैसा ब्रेकफास्ट देखकर ही खाने की इच्छा खत्म हो जाती है. ऐसे में आप दूसरे शहरों की खास ब्रेकफास्ट डिशेज भी ट्राई कर सकते हैं, अगर आपको तला-भुना खाने का मन नहीं है तो आप साउथ की कुछ पॉपुलर डिशेज ट्राई कर सकते हैं.

    कद्दू की सब्जी तो आप सभी ने खाई होगी, मगर कद्दू की सब्जी बच्चे खाने में मुंह बनाते हैं कि क्या बना दिया है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि कर्नाटक में कद्दू की एक खास डिश ब्रेकफास्ट में बनाई जाती है, जिसका स्वाद लाजवाब होता है और उसे बनाने में भी समय नहीं लगता है. कर्नाटक की डिश का नाम पंपकिन कडुबू है,  सूजी, ताजे कद्दू, नारियल और स्वीट कॉर्न से बनने वाली यह डिश स्वाद में बेहद बढ़िया होती है.

    खास बात यह है कि इसे तेल में तलने की बजाय केले के पत्ते में रखकर भाप में पकाया जाता है. यही वजह है कि यह नाश्ते या शाम के हल्के स्नैक के लिए एकदम परफेक्ट डिश है. कद्दू ना खाने का मन हो तो आप नाश्ते में उससे यह डिश बना सकते हैं. आइए आपको घर पर कद्दू कडुबू बनाने का तरीका बताते हैं.

    पंपकिन कडुबू बनाने के लिए सामग्री
        1 कप सूजी
        1 से 1½ कप कद्दूकस किया हुआ कद्दू
        ½ कप कद्दूकस किया हुआ नारियल
        2 हरी मिर्च, बारीक कटी हुई
        2 बड़े चम्मच हरा धनिया, बारीक कटा हुआ
        2 बड़े चम्मच स्वीट कॉर्न
        ¼ कप दही
        स्वादानुसार नमक
        केले के पत्ते, कडुबू को भाप में पकाने के लिए

    कद्दू कडुबू बनाने का तरीका

    • सबसे पहले एक बड़े कटोरे में सूजी, कद्दूकस किया हुआ कद्दू, नारियल, हरी मिर्च, हरा धनिया और स्वीट कॉर्न डालें. अब इसमें दही और स्वादानुसार नमक मिलाकर सभी चीजों को अच्छी तरह मिला दें.
    • इस मिक्सर को ढककर करीबन पांच मिनट के लिए रख दें. इस दौरान सूजी थोड़ी नमी सोख लेगी और मिक्सर आसानी से सेट हो जाएगा.
    • अब केले के पत्तों को गैस की स्लो फ्लेम के ऊपर हल्का-सा गर्म करें. इससे पत्ते नरम हो जाएंगे और आसानी से मोड़े जा सकेंगे.
    • इसके बाद केले के पत्ते पर तैयार मिक्सर की एक कलछी डालें और हल्के हाथ से थोड़ा फैला दें. पत्ते को मोड़कर मिक्सर को अच्छी तरह पैक कर दें.
    • अब इन केले के पत्तों के पैकेट को स्टीमर में रखें और करीब 10 से 15 मिनट तक भाप में पकाएं. जब कडुबू अच्छी तरह पक जाए, तो इसे स्टीमर से निकाल लें.
    • अगर आपके पास केले के पत्ते नहीं हैं, तो आप इस मिक्सर को इडली प्लेट में रखकर भी स्टीम कर सकते हैं.
    • चटनी के साथ आएगा स्वाद!

    कद्दू कडुबू को तीखी नारियल की चटनी के साथ सर्व करें. नारियल की चटनी के साथ इसका स्वाद कई गुना बढ़ जाता है. इसे रेसिपी को बनाने में भी समय नहीं लगता है और खाने में भी यह बहुत टेस्टी लगती है. इसे आप बच्चों के स्कूल में टिफिन में भी बनाकर दे सकते हैं.

    क्यों ट्राई करें यह रेसिपी?
    पंपकिन कडुबू की खासियत इसका स्वाद और बनाने का तरीका है. इसमें कद्दू और नारियल का हल्का मीठा स्वाद आता है, जबकि हरी मिर्च तीखापन बढ़ाती है. इसे डीप फ्राई करने की जरूरत नहीं पड़ती, इसलिए यह हल्के और नॉन-फ्राइड नाश्ते के तौर पर भी मेन्यू में शामिल करना आसान है.

     

  • रोज की दाल-सब्जी से हो गए हैं बोर? बनाएं झटपट नेपाली पनीर चुकौनी

    रोज की दाल-सब्जी से हो गए हैं बोर? बनाएं झटपट नेपाली पनीर चुकौनी

     लंच में रोजाना मसूर और चना दाल खाकर मन भर जाता है और उस समय लगता है कि खाने में कुछ चटपटा और टेस्टी मिल जाए तो मजा आ जाए. मगर सब्जी और दाल खाने का भी मन ना हो तो आप दही से बनने वाली एक फेमस नेपाली डिश ट्राई कर सकते हैं. नेपाली खाने की खासियत उनका सादा लेकिन मसालेदार स्वाद होता है.

    अगर आप रोज की पनीर की सब्जी से कुछ अलग ट्राई करना चाहते हैं, तो पनीर नेपाली चुकौनी बनाकर देख सकते हैं. पनीर, टमाटर, प्याज और चुनिंदा मसालों से तैयार यह डिश खाने में बेहद स्वादिष्ट लगती है और इसे घर पर आसानी से बनाया जा सकता है. आइए आपको दही-पनीर चुकौनी की रेसिपी बताते हैं.

    पनीर नेपाली चुकौनी बनाने के लिए सामग्री
        पनीर- 250 ग्राम
        1 कप – दही
        प्याज- 1 बारीक कटा हुआ
        टमाटर- 2 कटे हुए
        लहसुन की कलियां – 4
        हरी मिर्च- 1-2
        जीरा- 1 चम्मच
        हल्दी- ½ चम्मच
        धनिया पाउडर- 1 चम्मच
        लाल मिर्च पाउडर- ½ चम्मच
        गरम मसाला- ½ चम्मच
        नमक- स्वादानुसार
        तेल- 2 बड़े चम्मच
        हरा धनिया गार्निश के लिए

    कैसे बनाएं पनीर नेपाली चुकौनी?

    • सबसे पहले एक कटोरे में दही लें और उसे अच्छी तरह फेंट लें ताकि कोई लम्स न रहे.
    • इसके बाद दही में प्याज, हरी मिर्च और सिलबट्टे पर कूटा हुआ लहसुन और मसाले डालकर अच्छी तरह से मिक्स कर लें.
    • इसके बाद एक पैन में तड़के के लिए घी या गेल गर्म करें. जब तेल में से धुआं निकलने लगे तो इसमें जीरा और हल्दी-मिर्च का पाउडर डालकर गैस बंद कर दें.
    • इस तड़के को दही के ऊपर डाल दें और अच्छी तरह से मिक्स कर दें.
    • इसके बाद पनीर को टुकड़ों में काट लें और फिर पनीर पर हल्दी लगाकर मिक्स कर लें. पनीर को आप सीधे भी इस्तेमाल कर सकते हैं.
    • आप चाहें तो पनीर को पैन में हल्का तेल लाइट गोल्डन होने तक फ्राई कर सकते हैं. इससे स्वाद बढ़ जाता है.
    • आखिर में दही में पनीर डालकर मिला दें और ऊपर से हरा धनिया डालकर गार्निश कर दें.

    इस तरीके से करें सर्व
    पनीर चुकौनी को आप गरमा-गरम चावल के साथ सर्व कर सकते हैं, यह इसका स्वाद दाल-सब्जी से हटकर होता है. खाने में तो यह डिश टेस्टी लगती है, उसके साथ ही इसे बनाने में 10 से 15 मिनट का ही समय लगता है. आप इसमें मिर्च कम ज्यादा अपने हिसाब से कर सकते हैं और इसे बच्चे और बुजुर्ग सभी मजे से खाते हैं.

  • Instagram पर वायरल 80s AI फोटो के पीछे कितना खर्च होता है पानी और बिजली?

    Instagram पर वायरल 80s AI फोटो के पीछे कितना खर्च होता है पानी और बिजली?

    इंस्टाग्राम पर इन दिनों 80s लुक वाली AI तस्वीरों का ट्रेंड तेजी से वायरल हो रहा है. लोग अपनी सामान्य फोटो को AI की मदद से 1980 के दशक के कपड़े, हेयरस्टाइल, बैकग्राउंड और पुराने कैमरे जैसा लुक दे रहे हैं. इसके लिए फोटो AI टूल में डालनी होती है और कुछ ही समय में उसका नया वर्जन तैयार हो जाता है.

    लोगों के लिए यह काम भले ही कुछ सेकंड का है, लेकिन फोटो बनाने के पीछे AI सिस्टम को काफी काम करना पड़ता है. जब एक साथ बहुत सारे लोग ऐसी तस्वीरें बनाने लगते हैं, तो AI को ज्यादा फोटो बनाने की रिक्वेस्ट मिलती हैं. इन्हें पूरा करने के लिए डेटा सेंटर में लगे जीपीयू और सर्वर को ज्यादा काम करना पड़ता है. इससे बिजली का इस्तेमाल होता है. सर्वर गर्म भी होते हैं.

    AI से फोटो बनती कैसे है?
    AI से 80s वाली फोटो बनाना सिर्फ किसी फोटो पर फिल्टर लगाने जैसा नहीं है. AI आपकी फोटो और दिए गए प्रॉम्प्ट को समझकर एक नई इमेज तैयार करता है. इसके लिए AI सर्वर पर कई तरह की कैलकुलेशन होती हैं.

    एक रिसर्च में अलग-अलग AI इमेज-जनरेशन मॉडल की एनर्जी यूज को देखा गया. इसमें एक AI इमेज बनाने में औसतन करीब 2.9 Wh बिजली लगने का अनुमान मिला. हालांकि हर AI मॉडल में यह जरूरत अलग हो सकती है.

    अब अगर कोई व्यक्ति एक ही फोटो बनाकर रुक जाए तो इस्तेमाल होने वाली एनर्जी कम होगी. लेकिन ट्रेंड में लोग अक्सर कई तस्वीरें बनाते हैं. पहली फोटो पसंद नहीं आई तो फिर से जनरेट करते हैं, प्रॉम्प्ट बदलते हैं या अलग लुक आजमाते हैं. इससे AI को बार-बार नई इमेज बनाने का काम करना पड़ता है.

    ज्यादा काम करेंगे तो सर्वर गर्म होंगे
    AI की फोटो बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले जीपीयू और दूसरे कंप्यूटर चिप लगातार काम करते हैं. काम करने के दौरान इनमें गर्मी पैदा होती है. इसलिए डेटा सेंटर में सर्वर को ठंडा रखना जरूरी होता है. इसके लिए अलग-अलग कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं. कौन सा सिस्टम इस्तेमाल होगा, यह डेटा सेंटर की जगह और उसकी टेक्नोलॉजी पर निर्भर करता है.

    इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के मुताबिक, दुनिया भर के डेटा सेंटर ने 2024 में करीब 460 TWh बिजली इस्तेमाल की. अनुमान है कि 2030 तक यह खपत करीब 945 TWh हो सकती है. AI का बढ़ता इस्तेमाल इस बढ़ोतरी की बड़ी वजहों में शामिल है.

    यह आंकड़ा सिर्फ 80s वाली AI फोटो का नहीं है. इसमें दुनिया भर के डेटा सेंटर में होने वाला अलग-अलग तरह का काम शामिल है. इससे यह जरूर समझ आता है कि AI का इस्तेमाल बढ़ने पर डेटा सेंटर पर काम और बिजली की जरूरत भी बढ़ती है.

    सर्वर को ठंडा करने में पानी क्यों लगता है?
    कुछ डेटा सेंटर में सर्वर से निकलने वाली गर्मी को कम करने के लिए पानी का इस्तेमाल किया जाता है. ऐसे कूलिंग सिस्टम में पानी गर्मी को बाहर निकालने में मदद करता है. कुछ सिस्टम में पानी का एक हिस्सा भाप बनकर भी बाहर चला जाता है. हालांकि हर डेटा सेंटर में पानी का इस्तेमाल एक जैसा नहीं होता.

    जगह, मौसम और कूलिंग सिस्टम के हिसाब से पानी की खपत बदल सकती है. अमेरिका के लॉरेंस बर्कले नेशनल लेबोरेटरी की 2024 रिपोर्ट के मुताबिक, 2023 में अमेरिकी डेटा सेंटर में औसतन करीब 0.36 लीटर पानी प्रति kWh IT एनर्जी की साइट वॉटर कंजम्पशन थी. यह पूरे डेटा सेंटर सेक्टर का औसत आंकड़ा है

    तो 80s ट्रेंड का पानी पर कितना असर?
    ज्यादा लोग AI से तस्वीरें बनाएंगे तो AI को ज्यादा रिक्वेस्ट मिलेंगी. ज्यादा रिक्वेस्ट का मतलब सर्वर को ज्यादा काम करना होगा. ज्यादा कंप्यूटिंग से ज्यादा बिजली की जरूरत होगी और सर्वर ज्यादा गर्म होंगे. इन्हें ठंडा रखने के लिए कूलिंग की जरूरत पड़ेगी. और जिन डेटा सेंटर में पानी वाली कूलिंग इस्तेमाल होती है, वहां पानी की जरूरत भी बढ़ सकती है.

    यानी सोशल मीडिया पर दिख रही 80s वाली एक AI फोटो के पीछे सर्वर, बिजली और कूलिंग का पूरा सिस्टम काम कर रहा है. इस एक ट्रेंड की वजह से कितना पानी इस्तेमाल हुआ, यह अभी पता नहीं है. लेकिन AI से बनने वाली तस्वीरों की संख्या बढ़ने के साथ डेटा सेंटर पर कंप्यूटिंग और कूलिंग का काम भी बढ़ता है.  

  • चाणक्य नीति: अपनी योजनाएं हर किसी को न बताएं, सफलता के लिए अपनाएं ये खास मंत्र

    चाणक्य नीति: अपनी योजनाएं हर किसी को न बताएं, सफलता के लिए अपनाएं ये खास मंत्र

     रोजमर्रा की भागदौड़ में हम अक्सर कई ऐसी छोटी-छोटी गलतियां कर बैठते हैं, जो बाद में हमारी तरक्की की राह में बड़ी रुकावट बन जाती हैं. आचार्य चाणक्य ने अपनी नीतियों के माध्यम से इंसान के स्वभाव, कार्यशैली और सफलता के अनगिनत सूत्र बताए हैं.  उनकी नीतियां आज के आधुनिक दौर में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी सदियों पहले थीं.  चाणक्य का मानना था कि जीवन में सिर्फ कड़ी मेहनत करना ही काफी नहीं है, बल्कि सही समय पर सही रणनीति अपनाना और संयम रखना भी उतना ही जरूरी है.

    चाणक्य नीति का वह प्रसिद्ध श्लोक
    आचार्य चाणक्य ने अपनी नीति में एक बहुत ही महत्वपूर्ण श्लोक के जरिए सफलता का मूलमंत्र दिया है:

    'मनसा चिन्तितं कार्यं वाचा नैव प्रकाशयेत्.
    मन्त्रेण रक्षयेद् गूढं कार्ये चापि नियोजयेत्॥'

    अर्थात: मन में सोचे गए या तय किए गए किसी भी कार्य को, उसके पूरा होने से पहले हर किसी के सामने उजागर नहीं करना चाहिए.  अपनी योजनाओं और महत्वपूर्ण रणनीतियों को पूरी तरह से गुप्त रखते हुए उन्हें चुपचाप धरातल पर उतारने का प्रयास करना चाहिए.

    आधुनिक जीवन में इस नीति का व्यावहारिक महत्व
    आज के दौर में सोशल मीडिया और अत्यधिक मेल-जोल के चलते लोग अपने हर छोटे-बड़े कदम की जानकारी दूसरों के साथ तुरंत साझा कर देते हैं.  नया बिजनेस शुरू करना हो, करियर में कोई बड़ा बदलाव करना हो या कोई नया प्रोजेक्ट हाथ में लेना हो,लोग अक्सर योजना बनाते ही उसका ढिंढोरा पीट देते हैं.

    चाणक्य नीति के अनुसार, ऐसा करना भारी पड़ सकता है:
    नकारात्मक ऊर्जा और टोका-टाकी: जब आप अपनी योजनाएं पहले ही बता देते हैं, तो कई बार लोग अनचाही सलाह, नकारात्मक टिप्पणियां या आलोचना करने लगते हैं, जिससे आपका फोकस भटक जाता है.

    प्रतिस्पर्धा और बाधाएं: आपकी प्लानिंग समय से पहले लीक होने पर विरोधी या प्रतिस्पर्धी उसका फायदा उठा सकते हैं, जिससे काम में रुकावटें आ सकती हैं.

    मानसिक भटकाव: जब आप अपने लक्ष्य के बारे में लगातार बोलते रहते हैं, तो ऊर्जा उसे पूरा करने के बजाय केवल बातें बनाने में खर्च हो जाती है.

    काम को बोलने दें, दिखावे से बचें
    आचार्य चाणक्य का संदेश सीधा और स्पष्ट है, ज्यादा बोलकर अपनी ऊर्जा नष्ट करने के बजाय अपने काम को मजबूत बनाएं. जब आपकी योजनाएं गुप्त रहकर पूरी होती हैं, तो आपकी सफलता का शोर पूरी दुनिया खुद-ब-खुद सुनती है. इसलिए आज से ही इस नियम को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाएं: कम बोलें, अपनी योजनाओं को सीक्रेट रखें और अपने एक्शन को अपनी सफलता की गवाही बनने दें.