वाशिंगटन
अमेरिका और ईरान के बीच चल रहे तनाव में जल्द ही एक नया दौर देखने को मिल सकता है, क्योंकि यूएस ने अधिक लंबी दूरी की मिसाइलों को ईरान के खिलाफ इस्तेमाल होने वाले बेसों पर तैनात करने का फैसला किया है। ईरान युद्ध के लिए तैनात की गई यह लंबी दूरी की हथियार प्रणाली बेहद सटीक हमला करने वाले हथियारों में से एक है। लॉकहीड मार्टिन की ओर से निर्मित JASSM-ER क्रूज मिसाइलों की रेंज 930 किलोमीटर से अधिक है। यह मिसाइल दुश्मन की एयर डिफेंस सिस्टम से बाहर रहते हुए टारगेट को नष्ट करने के लिए बनाई गई है। चलिए JASSM-ER क्रूज मिसाइलों की खासियत जानते हैं…
1. JASSM-ER क्रूज मिसाइल 1000 पाउंड वजन वाले पेनेट्रेटिंग ब्लास्ट-फ्रैगमेंटेशन वारहेड से लैस है, जो मजबूत ठिकानों को भेदने में सक्षम है।
2. मिसाइल को अमेरिकी वायुसेना के फाइटर जेट जैसे F-15E, F-16 और बॉम्बर जैसे B-1B, B-2, B-52H से लॉन्च किया जा सकता है।
3. JASSM-ER मिसाइल की स्टेल्थ क्षमता इसे दुश्मन के रडार से बचाती है, जिससे पायलट सुरक्षित दूरी पर रहकर हमला कर सकते हैं।
4. प्रत्येक मिसाइल की कीमत लगभग 1.5 मिलियन डॉलर (12.7 करोड़ रुपये) है।
5. ईरान संघर्ष के पहले चार हफ्तों में अमेरिका ने एक हजार से अधिक JASSM-ER मिसाइलों का इस्तेमाल किया है।
अमेरिका अपनी कुल JASSM-ER इन्वेंट्री का लगभग 82 प्रतिशत हिस्सा ईरान युद्ध के लिए समर्पित कर चुका है। युद्ध से पहले करीब 2300 मिसाइलों में से अब केवल 425 मिसाइलें ही अन्य जगहों के लिए बची हैं। प्रशांत क्षेत्र और अमेरिकी भूमि से इन मिसाइलों को सेंट्रल कमांड बेस और ब्रिटेन के फेयरफोर्ड तक पहुंचाया जा रहा है। ट्रंप प्रशासन ने ईरान को स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने या शांति समझौता करने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम दिया है। इस संदर्भ में B-52H बॉम्बर की तैनाती भी देखी जा रही है।
JASSM परिवार की यह विस्तारित रेंज वाली वैरिएंट 2001 से लॉकहीड मार्टिन की ओर से बनाई जा रही है और दो दशकों से अमेरिकी सेना में सेवा दे रही है। इसका इस्तेमाल न केवल ईरान बल्कि वेनेजुएला जैसे अन्य अभियानों में भी हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी संख्या में मिसाइलों का उपयोग अमेरिका की अन्य क्षेत्रों जैसे चीन के खिलाफ तैयारियों को प्रभावित कर सकता है, लेकिन ईरान जैसे मजबूत एयर डिफेंस वाले देश के खिलाफ यह अत्यंत प्रभावी साबित हो रही है।
संयुक्त अरब अमीरात में भारत के पूर्व राजदूत संजय सुधीर ने पाकिस्तान की पश्चिम एशिया कूटनीति की सच्चाई उजागर करते हुए कहा है कि ईरान-अमेरिका संघर्ष में इस्लामाबाद कभी मध्यस्थ नहीं था, बल्कि अधिक से अधिक एक मैसेंजर की भूमिका ही निभा रहा था।
ईरान युद्ध के बीच पाकिस्तान खुद को बिचौलिया बता रहा था और दावा कर रहा था कि वह ईरान अमेरिका के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभा रहा है। लेकिन अब सच्चाई सामने आ गई है। संयुक्त अरब अमीरात में भारत के पूर्व राजदूत संजय सुधीर ने पाकिस्तान की पश्चिम एशिया कूटनीति की सच्चाई उजागर करते हुए कहा है कि ईरान-अमेरिका संघर्ष में इस्लामाबाद कभी मध्यस्थ नहीं था, बल्कि अधिक से अधिक एक मैसेंजर की भूमिका ही निभा रहा था। न्यूज एजेंसी एएनआई से विशेष बातचीत में सुधीर ने कहा कि पाकिस्तान कल तक खुद को मध्यस्थ बताकर ढोल पीट रहा था, लेकिन असल में वह मध्यस्थ होने से बहुत दूर था। वह ज्यादा से ज्यादा एक संदेशवाहक ही था। मध्यस्थता का मतलब होता है कि दोनों पक्ष आमने-सामने मध्यस्थ के साथ बैठकर बात करें, लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। इसलिए ईरान ने पाकिस्तान का ढोंग बेनकाब कर दिया है।
दरअसल, ईरान ने कथित तौर पर पाकिस्तानी धरती पर किसी भी अमेरिकी नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल से मिलने से इनकार कर दिया है। वॉल स्ट्रीट जर्नल की रिपोर्ट के अनुसार, तेहरान ने अमेरिकी मांगों को 'अस्वीकार्य' बताया है, जिससे शीघ्र समाधान की संभावना लगभग समाप्त हो गई है और पाकिस्तान के राजनयिक प्रयास हाशिए पर चले गए हैं। यह कूटनीतिक झटका ऐसे समय में लगा है जब पाकिस्तान आर्थिक रूप से बेहद कमजोर स्थिति में है। संयुक्त अरब अमीरात ने पाकिस्तान से एक महीने के अंदर अपने बकाया ऋणों का भुगतान करने की मांग की है।
















