धार
मध्य प्रदेश के धार में विवादित भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर पर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट के खुलासे के बाद जहां हिंदू पक्ष उत्साहित है तो वहीं मुस्लिम पक्ष इसको खारिज करते हुए 1903 के सर्वेक्षण की याद दिला रहा है। वहीं, कमाल मौला मस्जिद में हिंदुओं से जुड़े प्रतीक चिह्नों की मौजूदगी की बात कबूल करते हुए दलील दी जा रही है कि निर्माण में किसी मंदिर नहीं, बल्कि राजा भोज के महल के अवशेषों का इस्तेमाल किया गया था।

मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसाइटी के चेयरमैन और धार के मुस्लिम सदर (प्रमुख) अब्दुल समद इस केस में याचिकाकर्ता भी हैं। बातचीत में वह इंदौर हाई कोर्ट में पेश किए गए एएसआई रिपोर्ट को खारिज करते हुए कहते हैं, 'यह रिपोर्ट गलत दिशा में है। 1903 में एएसआई की रिपोर्ट में इस इमारत को कमाल मौला मस्जिद घोषित किया गया था और इसे संरक्षित किया गया। हम अदालत में नई रिपोर्ट को चुनौती देंगे।' समद ने आरोप लगाया कि परिसर में अधिकांश संरचनाओं को 'छिपे हुए मकसद' से लाया गया था।

वह कहते हैं, 'यह पूर्व नियोजित था। हम 2003 से इस पर आपत्ति जाहिर कर रहे हैं। सर्वे का आदेश 2024 में दिया गया था।' वह जोर देकर कहते हैं कि ब्रिटिश काल में हुए सर्वे में इस स्थान को मस्जिद बताया गया था। समद ने कहा, 'यह मस्जिद था, यह मस्जिद है। यहां नमाज पढ़ना जारी रहेगा।'

कमाल मौला मस्जिद का निर्माण और हिंदू प्रतीक चिह्न
समद कहते हैं कि मस्जिद का निर्माण निजामुद्दीन औलिया के करीब कमाल मौला ने कराया था, जो 1925 में धार के आसपास इस्लाम के प्रचार के लिए आए थे। उन्होंने इस क्षेत्र में कई मदरसों और मस्जिदों का निर्माण कराया। मालवा के शासक महमूद खिलजी ने इनके लिए जमीन उपलब्ध कराई थी।

अब्दुल समद ने कहा, 'तब भारी निर्माण सामग्रियों को लाना मुश्किल था इसलिए निर्माणकर्ताओं ने राजा भोज के महल के अवशेषों का इस्तेमाल कर लिया। राजा भोज के महल को गुजरात के चालुक्य-सोलंकी वंश ने नष्ट किया था। वे कुछ ढांचे गुजरात ले गए जबकि बाकी वहां पड़े रहे। चूंकि राजा भोज हिंदू राजा थे, परिसर में पाए जाने वाले ढांचे हिंदुओं के प्रतीक वाले होंगे।' उन्होंने कहा कि इन दलीलों को वह आगे कोर्ट में भी पेश करेंगे।

मंदिर मस्जिद विवाद और 2000 पन्नों की रिपोर्ट
पक्षकारों के मुताबिक एएसआई की 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि विवादित स्थल पर धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना पहले से मौजूद थी और वहां वर्तमान में मौजूद संरचना प्राचीन मंदिरों के हिस्सों से बनाई गई थी। भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष संभवतः 11वीं सदी के इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है और इस निकाय ने उच्च न्यायालय के आदेश पर दो साल पहले विवादित परिसर का सर्वेक्षण करके अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। रिपोर्ट को लेकर अदालत के ताजा आदेश के बाद इस विवादित स्थल का मसला फिर सुर्खियों में आ गया है।

नई रिपोर्ट में क्या कहा गया
पक्षकारों के मुताबिक 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में कहा गया,'प्राप्त स्थापत्य अवशेषों, मूर्तिकला के टुकड़ों, साहित्यिक ग्रंथों वाले शिलालेखों की बड़ी शिलाओं, स्तंभों पर नागकर्णिका शिलालेख आदि से संकेत मिलता है कि इस स्थल पर साहित्यिक और शैक्षिक गतिविधियों से संबंधित एक विशाल संरचना विद्यमान थी। वैज्ञानिक जांच के दौरान प्राप्त पुरातात्विक अवशेषों के आधार पर पहले से मौजूद इस संरचना को परमार काल का माना जा सकता है।' रिपोर्ट में कहा गया कि सर्वेक्षण के दौरान कुल 94 मूर्तियां, मूर्तिकला के टुकड़े और मूर्तिकला से सजे स्थापत्य तत्व पाए गए जो बेसाल्ट, संगमरमर, मृदु पत्थर, बलुआ पत्थर और चूना पत्थर से बने हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर और कमाल मौला के मकबरे में अरबी और फारसी के 56 शिलालेख भी मिले जिनमें मकबरे में रखीं शिलाएं और स्याही से लिखे 43 शिलालेख शामिल हैं।

क्या कहना है हिंदू पक्ष का
याचिकाकर्ताओं में शामिल 'हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस' के पक्षकार आशीष गोयल ने पीटीआई से कहा,'उच्च न्यायालय में विचाराधीन हमारी याचिका की मुख्य गुहार है कि विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप तय किया जाए। एएसआई की रिपोर्ट से हमारी इस बात को बल मिलता है कि भोजशाला एक परमारकालीन स्मारक है और इसे नुकसान पहुंचाकर एक नया ढांचा खड़ा किया गया था।' उन्होंने दावा किया कि एएसआई को वैज्ञानिक सर्वेक्षण में मिले सिक्के, मूर्तियां और शिलालेख दर्शाते हैं कि विवादित परिसर पर एक प्राचीन मंदिर था।