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  • कूनो में चीता प्रोजेक्ट की बड़ी खुशखबरी, भारत में जन्मी मादा ने दिए 4 शावक; संख्या 56 हुई

    कूनो में चीता प्रोजेक्ट की बड़ी खुशखबरी, भारत में जन्मी मादा ने दिए 4 शावक; संख्या 56 हुई

    श्योपुर

    प्रोजेक्ट चीता के 4 साल पूरे होने के एक दिन बाद 18 सितंबर को कूनो नेशनल पार्क में जन्मी मादा चीता KGP12 ने 4 शावकों को जन्म दिया। केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया पर यह जानकारी दी। भारत की धरती पर जन्मी मादा चीता KGP12 ने खुले जंगल में चार शावकों को जन्म दिया है। इस नए जन्म के साथ ही देश में चीतों की कुल संख्या बढ़कर 56 हो गई है, जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि चीते अब भारतीय जलवायु और जंगलों में पूरी तरह से रच-बस गए हैं।

    केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने साझा की खुशखबरी
    शावकों के जन्म की आधिकारिक जानकारी केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर साझा की। उन्होंने इस उपलब्धि पर खुशी जताते हुए लिखा, "4 साल, 4 नई जिंदगियां – प्रोजेक्ट चीता के लिए यह उम्मीद और सफलता का प्रतीक है।"

    भारत में दूसरी पीढ़ी की शुरुआत
    मादा चीता KGP12 का खुले जंगल में मां बनना इस प्रोजेक्ट की एक बहुत बड़ी कामयाबी है। KGP12 दक्षिण अफ्रीका से लाई गई मादा चीता 'गामिनी' की बेटी है। गामिनी भारत में शावकों को जन्म देने वाली पहली चीता थी। अब उसकी बेटी द्वारा शावकों को जन्म देना यह साबित करता है कि यह प्रोजेक्ट अब विदेशों से चीते 'लाने' के शुरुआती चरण से आगे बढ़कर भारत में उनके 'बसने और बढ़ने' के प्राकृतिक दौर में सफलतापूर्वक प्रवेश कर चुका है।

    कूनो में चीतों की संख्या में वृद्धि की उम्मीद
    KGP12 का भारत में जन्म लेना और अब उसके
    शावकों को जन्म देना प्रोजेक्ट चीता के लिए खास महत्व रखता है। इससे भारत में जन्मे चीतों के प्राकृतिक प्रजनन की प्रक्रिया बढ़ने का संकेत मिला है। कूनो में चीतों की संख्या बढ़ाने और उनके लिए अनुकूल माहौल बनाने के प्रयासों के बीच चार नए शावकों का जन्म वन्यजीव प्रेमियों के लिए भी अच्छी खबर है।

    पर्यावरण मंत्री ने इस मौके पर कूनो और प्रोजेक्ट चीता से जुड़े पूरे परिवार को बधाई दी। चार नए शावकों के जन्म के बाद कूनो में चीता संरक्षण अभियान की उपलब्धियों में एक और खास अध्याय जुड़ गया है। सीसीएफ उत्तम कुमार शर्मा ने इसकी जानकारी दी है।

    कूनो में चीता प्रोजेक्ट के 4 साल

    चार साल पहले 17 सितंबर 2022 को मध्यप्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में चीतों की वापसी हुई थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नामीबिया से लाए गए आठ चीतों को कूनो में छोड़ा था। अब इस परियोजना के चार साल पूरे होने पर 17 सितंबर को कूनो के टिकटोली गेट पर हजारों दीप जलाए । यह आयोजन सेवा संकल्प अभियान के तहत हुआ । चीतों की वापसी के चार साल बाद कूनो में उनकी संख्या बढ़ी है और यहां भारत में भी शावकों का जन्म हुआ है। परियोजना ने श्योपुर को देश ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिलाई है।

    4 साल में क्या बदला?
    चीता परियोजना के चार वर्ष पूरे होने पर देश में 52 चीते हैं। इनमें 49 कूनो नेशनल पार्क और 3 मंदसौर के गांधी सागर अभयारण्य में हैं। कुल 52 चीतों में से 32 का जन्म भारत में हुआ है। कूनो का प्राकृतिक वातावरण चीतों के प्रजनन के लिए अनुकूल साबित हुआ है। भारत में जन्मे शावकों ने परियोजना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

    17 सितंबर को कूनो में क्या होगा?
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जन्मदिन और चीता परियोजना के चार साल पूरे होने के मौके पर टिकटोली गेट पर हजारों दीप जलाए । दीपों के जरिए चीता संरक्षण और भारत में चीतों की वापसी के प्रति आभार व्यक्त किया ।  

     

  • नागोया एशियन गेम्स में मनु भाकर थामेंगी तिरंगा, शॉटपुट स्टार तूर होंगे दूसरे ध्वजवाहक

    नागोया एशियन गेम्स में मनु भाकर थामेंगी तिरंगा, शॉटपुट स्टार तूर होंगे दूसरे ध्वजवाहक

    नई दिल्ली
    भारत के अभियान प्रमुख (Chef de Mission) सहदेव यादव ने शुक्रवार को मनु के ध्वजवाहक बनने की पुष्टि की. उन्होंने कहा, ‘मनु भाकर एक ध्वजवाहक होंगी.’ इसके बाद भारतीय एथलेटिक्स महासंघ ने तूर के दूसरे ध्वजवाहक होने की पुष्टि की.

    मनु भाकर के लिए यह जिम्मेदारी खास है. पेरिस ओलंपिक 2024 में उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल और 10 मीटर एयर पिस्टल मिश्रित टीम स्पर्धा में कांस्य पदक जीते थे. वह स्वतंत्र भारत की पहली खिलाड़ी बनी थीं, जिन्होंने एक ही ओलंपिक में दो पदक जीते. वहीं तूर पिछले दो एशियाई खेलों में शॉटपुट का स्वर्ण पदक जीत चुके हैं. अब नागोया में दोनों भारत की अगुवाई करते हुए तिरंगा थामेंगे.

    उद्घाटन से पहले ही समारोह में रुकावट
    शनिवार को होने वाले आधिकारिक उद्घाटन से ठीक एक दिन पहले शुक्रवार को नागोया में पारंपरिक फ्लैग होस्टिंग समारोह आयोजित किया जाना था. इसमें भारत समेत पांच दलों को हिस्सा लेना था. लेकिन समारोह शुरू होने से पहले ही इसमें देरी हो गई और बाद में इसे अचानक रोक दिया गया.

    यमन, उत्तर कोरिया, फिलिस्तीन, भारत और तिमोर-लेस्ते के प्रतिनिधिमंडल गार्डन पियर पर मौजूद थे. भारत की ओर से चार डिप्टी शेफ डी मिशन अचंता शरत कमल, लिजो डेविड थोट्टन, अलकनंदा अशोक और अंजलि भागवत भी वहां मौजूद थे.

    स्थानीय आयोजकों ने देरी के लिए किसी एक टीम से जुड़ी ‘कुछ परेशानी’ का हवाला दिया. उन्होंने कहा कि स्थिति को करीब 15 मिनट में सामान्य करने की कोशिश की जाएगी. करीब 20 मिनट की देरी के बाद समारोह शुरू भी हुआ, लेकिन कुछ ही देर में इसे फिर रोकना पड़ा.

    शरत कमल और अंजलि भागवत मंच की ओर बढ़ चुके थे, लेकिन कार्यवाही रुकने के बाद उन्हें वापस प्रतीक्षा क्षेत्र में लौटना पड़ा. आयोजकों ने हालांकि यह स्पष्ट नहीं किया कि आखिर किस टीम से जुड़ी क्या परेशानी थी.

    नागोया में पहले भी उठ चुके हैं सवाल
    फ्लैग होस्टिंग समारोह में हुई यह रुकावट ऐसे समय आई है, जब नागोया एशियाई खेलों की आयोजन व्यवस्था पहले से ही चर्चा में है. खिलाड़ियों और अधिकारियों की ओर से आवास और परिवहन को लेकर शिकायतें सामने आ चुकी हैं.

    इस बार पारंपरिक गेम्स विलेज की जगह खिलाड़ियों और अधिकारियों के लिए कंटेनर शैली के आवास, होटल और कोस्टा सेरेना क्रूज शिप समेत अलग-अलग जगहों पर ठहरने की व्यवस्था की गई है. कमरों के आवंटन में देरी और ट्रेनिंग वेन्यू तक पहुंचने में परेशानी की बातें भी सामने आई हैं.

    भारतीय MMA खिलाड़ी वरुण सान्याल ने आवास व्यवस्था को लेकर चिंता जताई थी. भारत के शेफ डी मिशन सहदेव यादव ने भी व्यवस्थाओं में कुछ मिसमैनेजमेंट की बात स्वीकार की थी. बैडमिंटन स्टार सात्विकसाईराज रंकीरेड्डी ने बताया था कि भारतीय दल के कुछ सदस्यों को एक मौके पर बस के लिए कई घंटे इंतजार करना पड़ा.

    अब शुक्रवार की फ्लैग होस्टिंग में हुई रुकावट ने आयोजन व्यवस्था को लेकर चर्चा को और बढ़ा दिया है. हालांकि इसकी वजह के बारे में आयोजकों की ओर से विस्तृत जानकारी नहीं दी गई है.

    शनिवार को तिरंगे के साथ भारत की एंट्री
    एशियाई खेलों का आधिकारिक उद्घाटन शनिवार, 19 सितंबर को होना है. कई खेलों की प्रतियोगिताएं पहले ही शुरू हो चुकी हैं, लेकिन उद्घाटन समारोह के साथ खेलों का औपचारिक आगाज होगा.

  • लखनऊ में बिजली संकट से निपटने की तैयारी, 232 करोड़ का प्लान; बनेंगे 3 नए बिजली उपकेंद्र

    लखनऊ में बिजली संकट से निपटने की तैयारी, 232 करोड़ का प्लान; बनेंगे 3 नए बिजली उपकेंद्र

    लखनऊ
     इस गर्मी जिन बिजली उपकेंद्रों में उपभोक्ताओं ने बिजली संकट को लेकर नाराजगी जताई, घेराव किया और सड़क जाम की। वहां बिजली विभाग ने हकीकत जानने का प्रयास कि आखिर बिजली ने परेशान क्यों किया?

    इसकी रिपोर्ट तैयार की गई, जिसमें स्थानीय अवर अभियंता व सहायक अभियंता ने स्थलीय रिपोर्ट तैयार की और ट्रांसफार्मर क्षमता वृद्धि, नई 33 केवी लाइन, एक बिजली उपकेंद्र से दूसरी बिजली उपकेंद्र को इंटरलिंकिंग, पावर ट्रांसफार्मर क्षमता वृद्धि, 11 केवी लाइन निर्माण, रिले, कंट्रोल पैनल, आइसोलेटर सहित तीन नए बिजली उपकेंद्रों को शामिल करते हुए दर्जनों कामों के सुधार की सिफारिश की गई।

    मुख्यालय स्तर पर चर्चा हुई और लेसा के सभी चारों जोन से कुल 232 करोड़ का प्रस्ताव तैयार करके 26 सितंबर 2026 को प्रस्तावित बोर्ड आफ डायरेक्टर की बैठक में रखा जाएगा। इस एडिशन बिजनेस प्लान को स्वीकृति भी मिलने की सौ प्रतिशत संभावनाएं अफसरों ने जताई है। क्योंकि अगर यह व्यवस्था अभी से आगामी गर्मी के लिए नहीं की गई तो वर्ष 2027 में बिजली का सबसे ज्यादा बुरा हाल होगा और उपभोक्ता सड़कों पर उतरने को विवश होंगे।

    बनाए जाएंगे तीन उपकेंद्र
    अमौसी जोन के उतरेटिया, निलमथा, कल्ली पश्चिम, एकता नगर, पारा के लोगों ने बिजली संकट को लेकर गर्मी में खूब नाराजगी जताई। इसलिए यहां कल्ली पश्चिम, पारा और गोसाईगंज, मोहनलालगंज व पूरनपुर के बीच पड़ने वाले बेलीराम में बिजली संकट से उबरने के लिए तीन नए उपकेंद्र बनाए जाएंगे।

    इससे आगामी कई सालों तक बिजली संकट खत्म जाएगा। उतरेठिया में दस एमवी का पावर ट्रांसफार्मर रखे जाने से यहां भी संकट पूरी तरह से खत्म होगा। इसके लिए 90 कराेड़ रुपये का प्रस्ताव बनाया गया है। इसमें 63 से 250 केवीए तक 233 ट्रांसफार्मर लगाए जाएंगे, इनमें कइयों की क्षमतावृ़द्धि की जाएगी।

    लखनऊ मध्य जोन में 46 करोड़ का काम होगा। ऐशबाग बिजली उपकेंद्र में इस साल उपभोक्ताओं ने घेराव, तोड़फोड़ की थी, बिजली संकट से निजात दिलाने के लिए यहां दस एमवीए का पावर ट्रांसफार्मर लगाया जाएगा। इसके अलावा पुराने लखनऊ सहित कई बिजली उपकेंद्रों में छोटे व बड़े मिलाकर 564 काम कराए जाएंगे। यहां भी सौ से अधिक ट्रांसफार्मरों की क्षमता वृद्धि का काम किया जाएगा।

    जानकीपुरम जोन में प्रियदर्शनी, इंटिग्रल, सृष्टि सहित पांच बिजली उपकेंद्रों में पावर ट्रांसफार्मर पांच व दस एमवीए के लगाए जाएंगे। इसके अलावा 63 से 250 केवीए के 150 ट्रांसफार्मर अतिरिक्त लगेंगे और उनकी क्षमता बढ़ाई जाएगी। ऐसे तीन सौ से अधिक काम होंगे और उस पर 40 करोड़ खर्च होंगे।

    गोमती नगर जोन में चिनहट के शिवपुरी बिजली उपकेंद्र के लिए नई 33 केवी लाइन बनाने के साथ ही पावर ट्रासंफार्मर यहां लगाया जाएगा। इसके अलावा इंदिरा नगर, गोमती नगर, चिनहट सहित आसपास क्षेत्र में 74 नए ट्रांसफार्मर लगाए जाएंगे। इन कामों के लिए 56 करोड़ का प्रस्ताव तैयार किया गया है।

     

  • चाणक्य नीति: सुबह की ये 2 गलतियां घर में लाती हैं कंगाली, तुरंत बदलें आदतें आज

    चाणक्य नीति: सुबह की ये 2 गलतियां घर में लाती हैं कंगाली, तुरंत बदलें आदतें आज

    आचार्य चाणक्य को भारत के महान नीतिशास्त्रियों और अर्थशास्त्रियों में गिना जाता है. उनकी नीतियां और विचार आज के समय में भी उतने ही सटीक बैठते हैं, जितने सदियों पहले थे. कई बार ऐसा देखने को मिलता है कि व्यक्ति कड़ी मेहनत करके अच्छी खासी कमाई तो कर लेता है, लेकिन फिर भी उसके पास पैसा टिक नहीं पाता है. सैलरी आते ही हाथ खाली हो जाते हैं , आर्थिक तंगी घेरने लगती है.

    चाणक्य नीति के अनुसार, हमारी रोजमर्रा की आदतें और खास तौर पर सुबह की शुरुआत का तरीका हमारी आर्थिक स्थिति पर बहुत गहरा असर डालता है. अगर सुबह उठते ही कुछ खास बातों का ध्यान न रखा जाए, तो मां लक्ष्मी रुष्ट हो जाती हैं, घर में कंगाली आने लगती है. आइए जानते हैं कि वे कौन सी दो बड़ी गलतियां हैं जो सुबह के वक्त पैसों के टिकने में रुकावट बनती हैं:

    1. सुबह उठते ही घर में कलह या तनाव का माहौल बनाना
    आचार्य चाणक्य के अनुसार, दिन की शुरुआत हमेशा सकारात्मक और शांत माहौल में होनी चाहिए. जिन घरों में सुबह उठते ही वाद-विवाद, गुस्सा, चीख-चिल्लाहट या पैसों को लेकर बहसबाजी शुरू हो जाती है, वहां कभी भी बरकत नहीं होती. सुबह का तनावपूर्ण माहौल मानसिक स्थिति को तो बिगाड़ता ही है, साथ ही नकारात्मक ऊर्जा को भी बुलावा देता है. इसलिए सुबह के समय घर में शांति बनाए रखें और अनावश्यक तर्कों या कलह से दूर रहें.

    2. अन्न और धन का अनादर करना
    चाणक्य नीति में अन्न और धन दोनों को ही बहुत पवित्र और देवी लक्ष्मी का स्वरूप माना गया है. कई लोगों की आदत होती है कि वे सुबह के वक्त खाने-पीने की चीजों में कमियां निकालते हैं या जरूरत से ज्यादा खाना थाली में लेकर बर्बाद करते हैं. इसके अलावा, पैसों के लेन-देन या खर्च को लेकर सुबह-सुबह लापरवाह रवैया अपनाना भी भारी पड़ सकता है. अन्न का अपमान या धन का गलत इस्तेमाल करने वालों के पास कभी भी मां लक्ष्मी का वास नहीं टिकता है.

    आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए अपनाएं ये आसान आदतें:
    अनुशासित रूटीन: सुबह समय पर उठने की आदत डालें, अपने दिन की शुरुआत एक निश्चित योजना के साथ करें.

    बचत की आदत: अपनी कमाई में से कुछ हिस्सा हर महीने सेविंग (बचत) के रूप में जरूर अलग रखें.

    सकारात्मक सोच: सुबह उठकर खुद को शांत रखें, बेवजह के खर्चों पर लगाम लगाने की नीति अपनाएं.

  • कच्चा बादाम गर्ल अंजलि अरोड़ा बनेंगी माता सीता, देव शर्मा ने रामायण से जुड़े किए बड़े खुलासे

    कच्चा बादाम गर्ल अंजलि अरोड़ा बनेंगी माता सीता, देव शर्मा ने रामायण से जुड़े किए बड़े खुलासे

    'कच्चा बादाम' गर्ल के नाम से मशहूर अंजलि अरोड़ा अब बड़े पर्दे पर डेब्यू करने वाली हैं. फिल्म महाकाव्य श्री राम कथा में वो माता सीता का रोल निभा रही हैं, जो 25 सितंबर को रिलीज होने के लिए तैयार है. इसमें भगवान राम की भूमिका एक्टर देव शर्मा निभा रहे हैं, जिनका ये पहला बड़ा ब्रेक भी बन सकता है.

    अंजलि की 'रामायण' में बना राम
    फिल्म महाकाव्य श्री राम कथा का ट्रेलर बीते दिन एक शानदार तरीके से लॉन्च किया गया. इवेंट में कास्ट से रणबीर कपूर की आने वाली रामायण पर भी सवाल किए गए. देव शर्मा ने कहा कि उन्हें रामायण और आदिपुरुष में लक्ष्मण के रोल ऑफर हुए थे, लेकिन अंत में वो रिजेक्ट हो गए. मीडिया के सवालों पर एक्टर ने ये खुलासा किया था.

    देव ने कहा- इससे पहले मुझे आदिपुरुष और नितेश तिवारी की रामायण, दोनों फिल्मों में लक्ष्मण का किरदार ऑफर हुआ था. मेरे लुक टेस्ट भी लगभग फाइनल हो चुके थे, लेकिन बात नहीं बन पाई. एक फिल्म में मैं भगवान राम का किरदार निभाने वाले एक्टर से करीब दो इंच लंबा था, जबकि दूसरी में मेरा कद-काठी राम का किरदार निभाने वाले एक्टर जितनी ही भारी थी. इसी वजह से मुझे फाइनल नहीं किया गया. इससे मैं काफी निराश हुआ. मुझे लगा कि शायद रामायण से मेरा कनेक्शन इतना अच्छा नहीं है, तभी बार-बार मुझे इस प्रोजेक्ट से बाहर कर दिया जा रहा है.

    एक्टर का इस दौरान ये भी कहना था कि उन्हें जब फिल्म महाकाव्य श्री राम कथा ऑफर की गई थी, तब उन्होंने इसे ठुकराया था. वो ना तो रामायण पर बनी फिल्म करना चाहते हैं और ना ही लक्ष्मण का किरदार निभाना चाहते हैं. हालांकि, बाद में उन्हें लगा कि भगवान राम का किरदार निभाना उनकी किस्मत में लिखा था और लक्ष्मण के रोल के लिए पहले जो ऑफर्स उन्होंने ठुकराए थे, उनके पीछे भी कोई वजह थी.

    ट्रोल हुए देव शर्मा
    देव शर्मा के इन खुलासों से कई लोग सहमत नहीं दिखे हैं. वो एक्टर को जमकर ट्रोल कर रहे हैं, उनका मानना है कि ये सब झूठ है और वो फेंक रहे हैं. वहीं कई लोगों का कहना है कि देव ने लक्ष्मण के रोल के लिए ऑडिशन दिया होगा, जिसमें वो रिजेक्ट हुए होंगे.

    बात करें फिल्म महाकाव्य श्री राम कथा की, तो इसे ऑडियंस से काफी ट्रोलिंग का सामना करना पड़ रहा है. इसका ट्रेलर देख सब कह रहे हैं कि ये बुरे वीएफएक्स और खराब एक्टिंग से लबरेज है. सीता के रोल में अंजलि अरोड़ा भी जम नहीं रही हैं. रिलीज से पहले ही ऑडियंस मान चुकी है कि फिल्म फ्लॉप है. अब देखना है कि क्या 'कच्चा बादाम' गर्ल कोई कमाल दिखा पाती है या नहीं.

  • ‘साढ़े चार साल सुख-दुख में नहीं आए, अब पंचायत के बहाने कूद रहे बरसाती मेंढक’… संजय निषाद का तीखा हमला

    ‘साढ़े चार साल सुख-दुख में नहीं आए, अब पंचायत के बहाने कूद रहे बरसाती मेंढक’… संजय निषाद का तीखा हमला

    ‘साढ़े चार साल सुख-दुख में नहीं आए, अब पंचायत के बहाने कूद रहे बरसाती मेंढक’… संजय निषाद का तीखा हमला

    ‘फूलन देवी की हत्या करवाकर मछुआरा समाज की राजनीति रोकी’… संजय निषाद का परोक्ष रूप से सपा पर तीखा हमला 

    ‘मछुआरे दरी बिछाने वाली कौम नहीं, हक के लिए लड़ने वाली कौम हैं’… संजय निषाद का दो टूक संदेश

    ‘भेष बदल-बदलकर आएंगे बरसाती मेंढक, उनसे सावधान रहना है’… संजय निषाद ने मछुआरा समाज को चेताया

    लखनऊ
     उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री संजय निषाद ने आगामी चुनाव को देखते हुए शुक्रवार को मछुआरा समाज को सावधान करते हुए तीखा सोशल मीडिया पोस्ट किया है। उन्होंने कहा कि जो लोग साढ़े चार साल तक समाज के सुख-दुख में दिखाई नहीं दिए, वही अब पंचायत के बहाने मछुआरा समाज के आसपास नजर आने लगे हैं। संजय निषाद ने परोक्ष रूप से समाजवादी पार्टी पर निशाना साधते हुए ऐसे लोगों को ‘बरसाती मेंढक’ और ‘दरी बिछाने वाले सौदागर’ बताते हुए समाज से सतर्क रहने की अपील की। 

    ‘साढ़े चार साल नहीं आए, अब पंचायत के बहाने कूदने लगे’

    संजय निषाद ने मल्लाह, निषाद, केवट, कश्यप, बिंद, धीवर, कहार, बाथम, रायकवार और माझी समेत पूरे मछुआरा समुदाय को संबोधित करते हुए कहा कि चुनावी मौसम में ऐसे लोगों से सावधान रहना होगा, जो लंबे समय तक समाज के बीच नहीं रहे और अब पंचायत के बहाने उसके आसपास सक्रिय होने लगे हैं।

    उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि 'जो साढ़े चार साल आपके सुख-दुख में नहीं आए- अब दरी बिछाने वाले वही सौदागर पंचायत के बहाने आपके आसपास बरसाती मेंढक की तरह कूदने लगे हैं।'

    फूलन देवी की हत्या और राजनीतिक विरासत का मुद्दा

    संजय निषाद ने अपने पोस्ट में वीरांगना फूलन देवी का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने आरोप लगाया कि जिन लोगों ने फूलन देवी की हत्या करवाकर मछुआरा समाज की अलग राजनीति को खड़ा होने से रोकने का काम किया, उनसे और उनकी मदद करने वालों से समाज को सावधान रहना होगा।

    उन्होंने आगे आरोप लगाया कि जिस पार्टी ने फूलन देवी की हत्या की सुपारी दी, उनकी संपत्ति पर कब्जा कर लिया और उनकी राजनीतिक विरासत को मछुआरा समुदाय से छीनने का प्रयास किया, ऐसे लोग मछुआरा समाज का भला चाहने वाले नहीं हो सकते।

    दरअसल, फूलन देवी की हत्या को लेकर संजय निषाद सपा पर निशाना साधते रहे हैं। उनका दावा है कि फूलन देवी की बढ़ती लोकप्रियता देखकर सपा ने उनके खिलाफ साजिश की थी।

    ‘मछुआरे दरी बिछाने वाली कौम नहीं’

    संजय निषाद ने अपने पोस्ट में मछुआरा समाज की राजनीतिक पहचान को लेकर भी दो टूक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि 'मछुआरों की अब स्वतंत्र पहचान निषाद पार्टी हैं।' उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि मछुआरे दरी बिछाने वाली कौम नहीं हैं, बल्कि ओबीसी समाज के हक के लिए लड़ने वाली कौम हैं।

    उनका संदेश था कि समाज को चुनावी मौसम में आने वाले ऐसे चेहरों को पहचानना होगा, जो अलग-अलग रूप और भेष में उसके बीच पहुंचेंगे। संजय निषाद ने लिखा, 'बरसाती मेंढक भेष बदल-बदल के आएंगे। उनसे सावधान रहना है।'

    ‘समाज को अपने हक के लिए खड़ा होना होगा’

    संजय निषाद के इस पूरे पोस्ट में मछुआरा समाज की राजनीतिक पहचान, उसके अधिकार और अलग राजनीतिक ताकत के तौर पर खड़े होने का संदेश प्रमुखता से सामने आया। उन्होंने समाज को आगाह किया कि चुनावी मौसम में आने वाले राजनीतिक सौदागरों के बहकावे में आने के बजाय अपने हित और अधिकारों को प्राथमिकता देनी होगी।

  • संजू सैमसन ने अफगानिस्तान सीरीज में दिया करारा जवाब, 117 रन और 180 का स्ट्राइक रेट

    संजू सैमसन ने अफगानिस्तान सीरीज में दिया करारा जवाब, 117 रन और 180 का स्ट्राइक रेट

    नई दिल्ली
    अफगानिस्तान के खिलाफ तीसरे टी20 में अभिषेक शर्मा ने 30 गेंदों में शतक ठोककर खूब सुर्खियां बटोरीं, लेकिन इसी सीरीज में संजू सैमसन ने भी चुपचाप अपना जवाब दे दिया. इंग्लैंड और आयरलैंड दौरे पर लगातार नाकामी के बाद टीम से बाहर हुए संजू ने अफगानिस्तान के खिलाफ तीन मैचों में 117 रन बनाए, जिसमें दो अर्धशतक शामिल रहे. उनका स्ट्राइक रेट 180 रहा.

    गंभीर ने कहा कि इंग्लैंड में संजू को बाहर रखना उनके कोचिंग कार्यकाल का सबसे मुश्किल फैसला था. उन्होंने माना कि वर्ल्ड कप जीतने से पहले संजू के प्रदर्शन को देखते हुए यह फैसला आसान नहीं था. हालांकि, गंभीर ने यह भी कहा कि कई बार टीम मैनेजमेंट को खिलाड़ियों की मौजूदा फॉर्म के आधार पर फैसला लेना पड़ता है.

    गंभीर के मुताबिक टी20 क्रिकेट में सिर्फ रन या विकेट नहीं देखे जाते, बल्कि खिलाड़ी और टीम कितना इम्पैक्ट डाल रहे हैं, यह ज्यादा अहम है.

    इसी वजह से उन्होंने अभिषेक के 100 रन से ज्यादा टीम के पावरप्ले में 100 रन पूरे करने को बड़ी उपलब्धि बताया. उनके कोचिंग कार्यकाल में भारत ने पहली बार पावरप्ले में 100 रन बनाए. गंभीर ने कहा कि टीम को इसी आक्रामक सोच के साथ आगे बढ़ना है और अब अगला लक्ष्य 300 रन का स्कोर है.

    वर्ल्ड कप वाली टीम पर भरोसा क्यों?
    संजू के मामले में गंभीर ने एक और बात साफ की. उनका कहना था कि टीम मैनेजमेंट शुरू से ही वर्ल्ड कप जीतने वाली टीम के कॉम्बिनेशन पर वापस जाने को लेकर स्पष्ट था.

    गंभीर ने कहा कि कोई खिलाड़ी दो-तीन मैच या एक-दो सीरीज में नाकाम होने से खराब खिलाड़ी नहीं बन जाता. भारत एक वर्ल्ड कप से दूसरे वर्ल्ड कप तक अजेय रहा और वर्ल्ड कप जीता. ऐसे में सिर्फ दो-तीन नाकामियों के बाद उस टीम या उसके खिलाड़ियों पर भरोसा खत्म नहीं किया जा सकता.

    संजू आए तो वैभव को करना पड़ा इंतजार
    अफगानिस्तान सीरीज में संजू की वापसी का सीधा असर 15 साल के वैभव सूर्यवंशी पर पड़ा. वैभव को प्लेइंग इलेवन से बाहर होना पड़ा. गंभीर ने इसे वैभव के लिए झटका नहीं, बल्कि इंतजार का हिस्सा बताया. उन्होंने कहा कि टीम मैनेजमेंट को वैभव की प्रतिभा और वह क्या कर सकता है, इसकी पूरी जानकारी है. लेकिन जो खिलाड़ी करीब दो साल से लगातार अच्छा कर रहा है, वह उस खिलाड़ी से आगे रहेगा जो अभी टीम में आया है.

    उनका संदेश साफ था- चाहे खिलाड़ी 15 साल का हो या 30 साल का, अगर मौका मिलने के लिए इंतजार करना पड़ रहा है तो इंतजार करना होगा. भारतीय क्रिकेट में यही प्रतियोगिता है और टीम के ड्रेसिंग रूम में इस तरह की प्रतिभाओं की मौजूदगी ही टीम को मजबूत बनाती है.

  • रोटी नहीं फूलती और हो जाती है सख्त? आटा गूंथते समय इन 4 बातों का रखें ध्यान हमेशा

    रोटी नहीं फूलती और हो जाती है सख्त? आटा गूंथते समय इन 4 बातों का रखें ध्यान हमेशा

    घर में रोटी दिन एक में दो-तीन बार बनाई जाती है. ऐसे में कहना गलत नहीं होगा कि रोटी बनाना रोज का काम है. यूं तो सुनने में ये काम आसान लगता है, लेकिन बहुत से लोगों के लिए ये काम मुश्किल तब बन जाता है जब उनकी रोटी फूलती नहीं है और सॉफ्ट भी नहीं बनती है. कई घरों में एक छोटी-सी शिकायत अक्सर सुनने को मिलती है- 'रोटी फूलती ही नहीं, पता नहीं कहां गलती हो रही है!' कभी रोटी तवे पर पिचकी रह जाती है, कभी किनारे सूखे और सख्त हो जाते हैं और कभी बेलते समय आटा बार-बार सिकुड़ने लगता है. ऐसे में लोग अक्सर तवे की गर्मी या बेलने के तरीके को गलत बताते हैं.

    लेकिन कई बार असली गड़बड़ी रोटी तवे तक पहुंचने से पहले ही आटा गूंथने में हो चुकी होती है. अगर आटा सही तरीके से नहीं गूंथा गया, उसमें पानी कम या ज्यादा हो गया या उसे गूंथने के बाद आराम नहीं दिया गया, तो रोटी के फूलने में दिक्कत आ सकती है. आइए जानते हैं आटा गूंथते समय किन बातों का ध्यान रखना चाहिए, जिससे आपकी हर रोटी फूले और एकदम सॉफ्ट बने.

    आटा न बहुत कड़ा हो, न चिपचिपा
    अगर आप चाहते हैं कि आपकी सभी रोटी फूली-फूली और सॉफ्ट बने, तो आपको आटा गूंथते वक्त कुछ बातों का ध्यान रखना होगा. रोटी के लिए आटा ना तो बहुत कड़ा होना चाहिए और ना ही ज्यादा ढीला. हमेशा ध्यान रखें कि रोटी बनाने के लिए आया सॉफ्ट और मुलायम होना चाहिए. अगर आटा गूंथने के बाद कड़ा महसूस हो रहा है, तो संभव है कि उसमें पानी कम पड़ा हो. बहुत सूखे आटे से रोटी बेलते समय फट सकती है और पकने के बाद सख्त भी हो सकती है.

    वहीं पानी ज्यादा डालने से आटा चिपचिपा हो जाता है. इसलिए पानी हमेशा थोड़ा-थोड़ा डालकर आटा गूंथें. इसके साथ ही आटा गूंथते के लिए हमेशा गुनगुने पानी का इस्तेमाल करें.

    गूंथने के बाद आटे को दें थोड़ा आराम
    आटा गूंथते ही तुंरत रोटी बनाने की जल्दबाजी ना करें. अगर आप आटा गूंथने के तुरंत बाद लोई बनाकर रोटी बेलने लगेंगे तो वो कड़ी और टूटी-टूटी बन सकती है. आटे को ढककर 20 से 30 मिनट के लिए छोड़ दें. इससे आटा सेट होता है और बेलना आसान हो जाता है. अगर रोटी बेलते समय बार-बार सिकुड़ रही है, तो समझ जाएं कि आपने आटे को रेस्ट नहीं दिया है.

    बेलते समय भी रखें ध्यान
    आटा सही होने के बाद रोटी को बराबर मोटाई में बेलना जरूरी है. बहुत ज्यादा सूखा आटा लगाने से रोटी सूखी हो सकती है, इसलिए जरूरत के हिसाब से ही सूखा आटा लगाएं. कोशिश करें कि रोटी बीच से बहुत मोटी और किनारों से बहुत पतली न हो.

    तवा भी ज्यादा ठंडा या गर्म न हो
    रोटी फूलने के लिए तवे का सही तरह से गर्म होना भी जरूरी है. तवा कम गर्म होगा तो रोटी सूख सकती है, जबकि बहुत ज्यादा गर्म होने पर बाहर से जल्दी सिक सकती है. तवा अच्छी तरह गर्म करने के बाद रोटी डालें और सही समय पर पलटें. दूसरी तरफ हल्के भूरे निशान आने के बाद दोबारा पलटकर हल्के हाथ से दबाने पर रोटी फूल सकती है.

    अगर आप इन सभी बातों का ध्यान रखते हैं, तो आपकी रोटी फूली-फूली और सॉफ्ट बनती है.

  • महाभारत के 7 अनसुने रहस्य, शिखंडी से दुर्योधन तक जानिए पूरी कहानी और रहस्य

    महाभारत के 7 अनसुने रहस्य, शिखंडी से दुर्योधन तक जानिए पूरी कहानी और रहस्य

    महाभारत केवल एक युद्ध की कहानी नहीं है. यह ऐसा महाग्रंथ है, जिसमें धर्म-अधर्म के संघर्ष के साथ-साथ रिश्तों, वचनों, त्याग, बदले और कर्म की कई कहानियां छिपी हुई हैं. कुरुक्षेत्र के इस युद्ध में भाई ने भाई के खिलाफ हथियार उठाया, शिष्य ने अपने गुरु से युद्ध किया और एक ही परिवार के लोग एक-दूसरे के सामने खड़े हो गए. महाभारत की यही खासियत है कि इसे जितनी बार पढ़ा जाए, हर बार कोई न कोई नई कथा या रहस्य सामने आता है. आज हम आपको महाभारत से जुड़े ऐसे ही कुछ प्रसंग बताएंगे, जिनका संबंध सीधे कुरुक्षेत्र युद्ध और उसके प्रमुख पात्रों से है.

    अंबा की कहानी और शिखंडी का जन्म
    महाभारत युद्ध में भीष्म पितामह की मृत्यु के पीछे शिखंडी की महत्वपूर्ण भूमिका थी. लेकिन शिखंडी के पीछे एक ऐसी कहानी थी, जो वर्षों पुराने अपमान और प्रतिशोध से जुड़ी थी. शिखंडी का पूर्वजन्म अंबा के रूप में बताया जाता है. अंबा काशी नरेश की पुत्री थीं. उनके साथ हुई घटनाओं के बाद उनके मन में भीष्म के प्रति गहरा आक्रोश पैदा हुआ. उन्होंने भीष्म के वध का संकल्प लिया और भगवान शिव की कठोर तपस्या की.

    मान्यता है कि भगवान शिव ने उन्हें वर दिया कि अगले जन्म में वह भीष्म की मृत्यु का कारण बनेंगी. इसके बाद अंबा ने अगले जन्म में शिखंडी के रूप में जन्म लिया था. कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान भीष्म शिखंडी के सामने अस्त्र उठाने से पीछे हट गए, क्योंकि वे शिखंडी को अंबा का पुनर्जन्म मानते थे. इसी परिस्थिति का लाभ उठाकर अर्जुन ने भीष्म पर बाण चलाए और अंततः भीष्म शरशय्या पर जा गिरे थे.

    अंबिका और अंबालिका के पुत्र कौन थे?
    अंबा के अलावा काशी नरेश की दो अन्य पुत्रियां थीं, अंबिका और अंबालिका. दोनों का विवाह हस्तिनापुर के राजकुमार विचित्रवीर्य से हुआ था. लेकिन विवाह के कुछ समय बाद ही विचित्रवीर्य की मृत्यु हो गई. उनके कोई संतान नहीं थी. ऐसे में हस्तिनापुर के राजवंश और सिंहासन के भविष्य को लेकर सत्यवती चिंतित हो उठीं.

    तब सत्यवती ने अपने पुत्र महर्षि वेदव्यास को बुलाया. धार्मिक परंपरा में वर्णित कथा के अनुसार, वंश को आगे बढ़ाने के लिए नियोग की व्यवस्था के तहत अंबिका और अंबालिका से संतान उत्पन्न करने की बात सामने आई. जब अंबिका वेदव्यास के सामने गईं तो भय के कारण उन्होंने अपनी आंखें बंद कर लीं. मान्यता है कि इसी वजह से उनके पुत्र धृतराष्ट्र जन्म से नेत्रहीन हुए. वहीं अंबालिका वेदव्यास को देखकर भय से पीली पड़ गईं. उनके पुत्र पांडु के शरीर का वर्ण पीला बताया गया.

    सत्यवती को जब यह पता चला कि दोनों राजकुमारों में कुछ विशेष शारीरिक परिस्थितियां हैं, तो उन्होंने स्वस्थ संतान की इच्छा से दोबारा प्रयास करने को कहा. लेकिन अंबिका खुद नहीं गईं और उन्होंने अपनी दासी को भेज दिया. उस दासी से विदुर का जन्म हुआ. विदुर आगे चलकर हस्तिनापुर के अत्यंत बुद्धिमान और नीति-कुशल मंत्री बने.

    यक्ष ने पांडवों से पूछे थे कठिन सवाल
    महाभारत का एक बेहद प्रसिद्ध प्रसंग पांडवों के वनवास के समय का है. वनवास के दौरान एक दिन पांडवों को बहुत प्यास लगी. पानी की तलाश में नकुल एक सरोवर के पास पहुंचे. वहां उन्हें एक अदृश्य आवाज सुनाई दी. आवाज ने चेतावनी दी कि सरोवर का पानी पीने से पहले उसके सवालों का जवाब देना होगा. लेकिन नकुल ने उस चेतावनी पर ध्यान नहीं दिया और पानी पी लिया. कथा के अनुसार, वह वहीं अचेत होकर गिर पड़े.

    जब नकुल वापस नहीं लौटे तो सहदेव उन्हें खोजने गए. उनके साथ भी यही हुआ. इसके बाद अर्जुन और भीम वहां पहुंचे, लेकिन उन्होंने भी उस चेतावनी को नजरअंदाज किया और सरोवर का पानी पीते ही अचेत होकर गिर पड़े. अंत में युधिष्ठिर वहां पहुंचे. उन्होंने अपने चारों भाइयों को इस हालत में देखा तो दुखी हुए. जब वह सरोवर का पानी पीने के लिए आगे बढ़े, तो वही आवाज फिर सुनाई दी. युधिष्ठिर ने जल्दबाजी करने के बजाय उस अदृश्य सत्ता की बात मान ली और उसके सवालों का जवाब देने के लिए तैयार हो गए.

    यक्ष के सवालों का युधिष्ठिर ने दिया जवाब
    यक्ष ने युधिष्ठिर से जीवन और धर्म से जुड़े कई कठिन सवाल पूछे. इन सवालों को महाभारत के 'यक्ष प्रश्न' के नाम से जाना जाता है. यक्ष ने पूछा कि हवा से भी तेज क्या चलता है? युधिष्ठिर ने उत्तर दिया- मन.

    इसके बाद पूछा गया कि पृथ्वी से भारी क्या है? युधिष्ठिर ने माता को इसका उत्तर बताया. आकाश से ऊंचा क्या है? इस पर उन्होंने पिता को उत्तर दिया. इसी तरह यक्ष ने उनसे धर्म, जीवन, मृत्यु और मनुष्य के आचरण से जुड़े कई प्रश्न पूछे. युधिष्ठिर ने सभी प्रश्नों के संतुलित उत्तर दिए.

    युधिष्ठिर ने नकुल को ही क्यों चुना?
    यक्ष युधिष्ठिर के जवाबों से प्रसन्न हुए और उनसे कहा कि वह अपने चारों भाइयों में से किसी एक को जीवित कर सकते हैं. युधिष्ठिर ने नकुल को जीवित करने की इच्छा जताई. यक्ष ने पूछा कि उन्होंने भीम या अर्जुन को क्यों नहीं चुना, जबकि युद्ध के समय उनकी आवश्यकता अधिक थी.

    युधिष्ठिर ने कहा कि वह माता कुंती के पुत्र हैं और नकुल माता माद्री के. कुंती का एक पुत्र जीवित है, इसलिए माद्री का भी एक पुत्र जीवित रहना चाहिए. युधिष्ठिर की इस बात से यक्ष प्रसन्न हुए. महाभारत की कथा के अनुसार, वह यक्ष वास्तव में धर्मदेव थे. उन्होंने युधिष्ठिर को आशीर्वाद दिया और उनके सभी भाइयों को पुनर्जीवित कर दिया.

    श्री कृष्ण ने शिशुपाल की 100 गलतियां क्यों माफ कीं?
    महाभारत में श्रीकृष्ण को केवल योद्धा या अर्जुन के सारथी के रूप में ही नहीं, बल्कि अपने वचन का पालन करने वाले व्यक्ति के रूप में भी देखा जाता है. राजसूय यज्ञ के दौरान युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण को अग्रपूजा के योग्य माना. लेकिन शिशुपाल इससे बेहद नाराज हो गया और भरी सभा में कृष्ण का अपमान करने लगा.

    शिशुपाल की मां श्रीकृष्ण की बुआ थीं. शिशुपाल के जन्म से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा के अनुसार, वह सामान्य बालक की तरह पैदा नहीं हुआ था. उसके तीन नेत्र और चार भुजाएं थीं. भविष्यवाणी की गई थी कि जिस व्यक्ति की गोद में जाने के बाद उसके अतिरिक्त अंग सामान्य हो जाएंगे, वही आगे चलकर उसकी मृत्यु का कारण बनेगा.

    जब शिशुपाल को श्रीकृष्ण की गोद में रखा गया तो उसके अतिरिक्त नेत्र और दो भुजाएं गायब हो गईं. यह देखकर उसकी मां चिंतित हो गईं और उन्होंने कृष्ण से शिशुपाल को क्षमा करने का वचन मांगा. कथा के अनुसार, श्रीकृष्ण ने वचन दिया कि वह शिशुपाल के सौ अपराधों को क्षमा करेंगे. राजसूय यज्ञ के दौरान शिशुपाल लगातार कृष्ण का अपमान करता रहा. जब उसके सौ अपराध पूरे हो गए, तब कृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से उसका वध कर दिया था.

    रुक्मिणी को लेकर शिशुपाल के मन में क्यों था आक्रोश?
    शिशुपाल का विवाह रुक्मिणी से होना तय बताया जाता है, लेकिन रुक्मिणी श्रीकृष्ण को अपना पति बनाना चाहती थीं. उन्होंने श्री कृष्ण को संदेश भेजकर अपनी इच्छा बताई थी. इसके बाद कृष्ण रुक्मिणी को लेकर विदर्भ से चले गए और दोनों का विवाह हुआ.

    रुक्मिणी से जुड़ी इस घटना को भी शिशुपाल के मन में कृष्ण के प्रति बढ़ती शत्रुता से जोड़कर देखा जाता है. हालांकि, शिशुपाल और कृष्ण की दुश्मनी के पीछे केवल यही एक कारण नहीं माना जाता.

    दुर्योधन को गांधारी से मिला था वज्र जैसा शरीर?
    महाभारत से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कथाओं में एक गांधारी और दुर्योधन की भी है. कुरुक्षेत्र युद्ध के 18वें दिन से पहले गांधारी अपने 100 पुत्रों में से केवल दुर्योधन को जीवित देख रही थीं. वह अपने आखिरी पुत्र को भी खोना नहीं चाहती थीं.

    एक प्रचलित कथा के अनुसार, वर्षों तक आंखों पर पट्टी बांधकर रहने के कारण गांधारी ने ऐसी तपस्या-शक्ति प्राप्त कर ली थी, जिससे उनकी दृष्टि अत्यंत शक्तिशाली हो गई थी. उन्होंने दुर्योधन को आदेश दिया कि वह स्नान करके बिना वस्त्रों के उनके सामने आए.

    कथा के लोकप्रिय संस्करण में बताया जाता है कि रास्ते में श्रीकृष्ण ने दुर्योधन को अपनी मां के सामने इस तरह जाने पर संकोच कराया. इसके बाद दुर्योधन ने अपनी जंघा को पत्तों से ढक लिया. जब गांधारी ने अपनी आंखों की पट्टी हटाकर दुर्योधन को देखा तो उनकी दृष्टि से उसके शरीर का अधिकांश हिस्सा वज्र के समान कठोर हो गया. लेकिन पत्तों से ढकी उसकी जंघाएं वैसी नहीं बन सकीं.

    भीम ने दुर्योधन की जंघा पर ही क्यों किया वार?
    अगले दिन भीम और दुर्योधन के बीच गदा युद्ध हुआ. दुर्योधन को गदा युद्ध में बेहद कुशल योद्धा माना जाता था. युद्ध के दौरान भीम के कई प्रहार दुर्योधन पर प्रभावी नहीं हो रहे थे. इसी बीच श्रीकृष्ण ने भीम को दुर्योधन की जंघा की ओर संकेत किया.

    इसके बाद भीम ने दुर्योधन की जंघा पर प्रहार किया और वह गंभीर रूप से घायल होकर भूमि पर गिर पड़ा. हालांकि, दुर्योधन के शरीर को गांधारी की दृष्टि से वज्र के समान बनने और कृष्ण द्वारा उसे पत्तों से ढकने की कथा महाभारत की लोकप्रिय परंपराओं में मिलती है, जबकि इसके विवरण विभिन्न ग्रंथीय संस्करणों में अलग-अलग मिलते हैं. इसलिए इसे एक ही रूप में सभी पाठों का समान वर्णन नहीं माना जाना चाहिए.

    महाभारत की यही विशेषता है कि इसमें युद्ध के साथ-साथ मनुष्य के निर्णय, वचन, धर्म, रिश्तों और कर्म के परिणामों की भी गहरी कथाएं मिलती हैं. शिखंडी की प्रतिशोध की कहानी हो, यक्ष के सामने युधिष्ठिर की परीक्षा, शिशुपाल और कृष्ण का प्रसंग या दुर्योधन का अंतिम युद्ध, हर कथा अपने भीतर एक अलग संदेश और धार्मिक परंपरा समेटे हुए है.

  • भोपाल पश्चिमी बायपास की पर्यावरण रिपोर्ट पर सवाल, सागर बायपास का कंटेंट कॉपी-पेस्ट करने का आरोप

    भोपाल पश्चिमी बायपास की पर्यावरण रिपोर्ट पर सवाल, सागर बायपास का कंटेंट कॉपी-पेस्ट करने का आरोप

    भोपाल

     भोपाल रिंग रोड को पूरा करने वाला करीब 3000 करोड़ के प्रोजेक्ट में भी इंजीनियरों का हैरतअंगेज खेल सामने आया है। भोपाल, नर्मदापुर, नागपुर, जबलपुर और इंदौर जाने वालों के लिए 25 किमी तक की दूरी कम करने वाले पश्चिमी बायपास की पर्यावरणीय रिपोर्ट बनाने में ही जिम्मेदारों ने बड़ी लापरवाही कर दी। रतनपुर से फंदा तक 36 किमी लंबे पश्चिमी बायपास के प्रोजेक्ट की पर्यावरणीय रिपोर्ट में सागर के बायपास की पर्यावरणीय रिपोर्ट को कॉपी पेस्ट कर पश्चिमी बायपास की पर्यावरणीय रिपोर्ट तैयार कर दी गई। हिन्दी और अंग्रेजी दोनों ही रिपोर्ट्स में ऐसी ही गलतियां हैं। इस रिपोर्ट के ड्राफ्ट पर आपत्तियां ली जा रही हैं। 25 सितंबर को इस पर आमला गांव में सुनवाई होगी। इसके बाद जमीनी काम शुरू होगा।

    सामने आ रही अफसरों की लापरवाही
    बता दें, पर्यावरणीय कारणों से ही प्रोजेक्ट का अलाइनमेंट एक बार बदला गया था। 4 किमी की लंबाई घटाकर 40 किमी से 36 किमी का किया। इसमें भी पर्यावरणीय रिपोर्ट की गड़बड़ी और सागर जिले के उल्लेख से अफसरों की लापरवाही सामने आ रही है। अब प्रोजेक्ट पर काम कर रहे एमपीआरडीसी के एजीएम एसपी दुबे का कहना है कि गड़बड़ी दिखवा लेंगे। भोपाल रिंग रोड प्रोजेक्ट, जिसे मुख्य रूप से भोपाल पश्चिमी बायपास (Bhopal Western Bypass) के रूप में जाना जाता है। भोपाल के ट्रैफिक को शहर के बाहर से ही डायवर्ट करने के लिए बनाई जा रही एक महत्वपूर्ण सड़क परियोजना है।

    ऐसे समझें प्रोजेक्ट रिपोर्ट में गड़बड़ियां

    -हिन्दी की रिपोर्ट के अनुभाग 1.7 में पर्यावरण प्रबंधन योजना में पर्यावरण संरक्षण के उपाय के लिए अंकों में बजट 05 करोड़ 12 हजार 722 रुपए लिखे हैं। जबकि शब्दों में चौबीस करोड़ छह लाख दो हजार आठ सौ नब्बे रुपए लिखा गया है।

    -हिन्दी की रिपोर्ट के अनुभाग 15 में पर्यावरण निगरानी कार्यों के लिए अंकों में 10,64,000 रुपए लिखे हैं। शब्दों इसे सात लाख छप्पन हजार रुपए लिखा।

    -अंग्रेजी की रिपोर्ट में टेबल 1.2 की एन्वायरमेंटल लेजिसलेशंस में 3 नंबर पर लिखा है, प्रोजेक्ट अलाइनमेंट इज पासिंग थू रिजर्ल्ड एंड प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट ऑफ एबाउट 47 हेक्टेयर लेंथ 6058 मीटर डिस्ट्रिक्ट सागर इन स्टेट ऑफ एमपी। जाहिर है, ये सागर जिले की सड़क की बात है।