भोपाल
मध्य प्रदेश में इस साल मानसून की बेरुखी से राज्य के आधे हिस्से में सूखे जैसे हालात पैदा हो गए हैं। प्रदेश के 55 में से 30 जिलों में सामान्य बारिश का कोटा पूरा नहीं हो सका है, जिनमें से 11 जिलों में तो 80 प्रतिशत से भी कम बारिश दर्ज की गई है। इस अनियमित बारिश का सीधा असर फसलों, पेयजल आपूर्ति, जल विद्युत उत्पादन और राज्य की अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय माना जा रहा है। दरअसल, प्रदेश में दक्षिण-पश्चिम मानसून की सामान्य बारिश का औसत 37.3 इंच है, जबकि इस बार केवल 35.6 इंच (95.4 फीसदी) बारिश दर्ज की गई। यह सामान्य से लगभग 4 प्रतिशत कम है।

5 साल में सबसे सूखा मानसून
वर्ष 2022 में सर्वाधिक 46 इंच बारिश हुई थी, जबकि 2023 में 37.2 इंच, 2024 में 40.2 इंच और 2025 में 45.2 इंच पानी गिरा था। इस बार 35.6 इंच के साथ यह बीते 5 वर्षों की सबसे कम बारिश है। मात्र 0.6 फीसदी की कमी के कारण मध्य प्रदेश सामान्य से कम बारिश वाली श्रेणी में चला गया है।प्रदेश में इस बार 5 साल की तुलना में सबसे कम बारिश रिकॉर्ड की गई है। साल 2022 में सबसे ज्यादा 46 इंच पानी गिरा था। 2023 में 37.2 इंच, 2024 में 40.2 इंच और 2025 में 45.2 इंच बारिश हुई थी। वहीं इस बार 35.8 इंच पानी ही गिरा है।

बता दें कि इस बार मानसून 9 दिन देरी से 24 जून को पहुंचा था और अगले 9 दिन में पूरे प्रदेश को कवर कर लिया। देरी की वजह से प्रदेश में जून में 30 प्रतिशत बारिश कम हुई थी, लेकिन जुलाई के पहले सप्ताह में ये आंकड़ा प्लस में 8 प्रतिशत पर आ गया।

अगस्त के दूसरे सप्ताह में भारी बारिश का दौर शुरू हो गया, जो आखिरी तक तक जारी रहा। सितंबर के पहले सप्ताह में भारी बारिश का दौर बना रहा। तीसरे सप्ताह पश्चिमी हिस्से में अच्छी बारिश हुई। आखिरी सप्ताह प्रदेशभर में कहीं तेज तो कहीं हल्की बारिश हुई।

पश्चिम में कम, पूर्व में ज्यादा बारिश
मध्यप्रदेश के पश्चिमी हिस्से (इंदौर, उज्जैन, नर्मदापुरम, ग्वालियर-चंबल संभाग) में सामान्य से 12 फीसदी कम बारिश हुई, जबकि पूर्वी हिस्से (जबलपुर, रीवा, सागर, शहडोल संभाग) में 4 प्रतिशत अधिक बारिश दर्ज की गई।

जून का घाटा नहीं भर पाए जुलाई-सितंबर
मानसून ने इस बार 9 दिन की देरी से 24 जून को दस्तक दी थी। जून के महीने में बारिश में 30 फीसदी की भारी कमी दर्ज की गई। जुलाई, अगस्त और सितंबर में कोटे से अधिक बारिश हुई, लेकिन यह शुरुआती घाटे की भरपाई नहीं कर सकी।

जुलाई, अगस्त और सितंबर में कोटे से ज्यादा बारिश

जुलाई, अगस्त और सितंबर में कोटे से ज्यादा पानी गिरा, लेकिन वह जून की भरपाई नहीं कर सका। लिहाजा, प्रदेश में सामान्य से कम बारिश रिकॉर्ड की गई। मानसूनी पीरियड 30 सितंबर तक 904 मिमी, यानी 35.6 इंच (95.4 प्रतिशत) रिकॉर्ड की गई, जो 'सामान्य बारिश' की कैटेगिरी से नीचे है।

IMD (मौसम केंद्र) के मुताबिक, 96 से 104 प्रतिशत बारिश ही 'सामान्य बारिश' की कैटेगिरी में शामिल हैं। यदि 0.6% पानी और गिर जाता तो प्रदेश इस कैटेगिरी में पहुंच जाता, यानी इस बार प्रदेश में 'सामान्य से कम' बारिश दर्ज हुई है।

सोयाबीन और गेहूं का उत्पादन घटेगा
मालवा सहित इंदौर और नर्मदापुरम में कम बारिश से सोयाबीन उत्पादन प्रभावित होगा। इस साल प्रदेश में 52 लाख हेक्टेयर में सोयाबीन और कुल 134.31 लाख हेक्टेयर में खरीफ फसलों की बोवनी हुई है। दावा किया जा रहा है कि पश्चिमी हिस्से में पानी की कमी से सोयाबीन का उत्पादन 2 से 3 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक घट सकता है। वहीं पानी की कमी के कारण आगामी रबी सीजन में गेहूं और चने की बोवनी भी प्रभावित होगी।

19 प्रमुख बांध रीते, पेयजल और बिजली पर खतरा
प्रदेश के कुल 54 बड़े बांधों में से 35 बांध 90 फीसदी या उससे अधिक भरे हैं। वहीं 19 बांधों में पानी का स्तर 10 से 90 प्रतिशत के बीच अटका हुआ है। जल संसाधन मंत्री तुलसीराम सिलावट ने 90 फीसदी से अधिक भरे बांधों की विशेष निगरानी के निर्देश दिए हैं। वहीं गांधीसागर, ओंकारेश्वर, इंदिरा सागर, राजघाट और मणिखेड़ा जैसे 5 बड़े जल विद्युत गृहों में जलस्तर कम रहने से हाइड्रो पावर उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है।

इस बार बारिश का लंबा दौर नहीं रहा
मौसम विशेषज्ञ शैलेंद्र कुमार नायक कहते हैं- इस बार प्रदेश में बारिश का ट्रेंड बदला हुआ देखने को मिला। कई जिलों में इतनी अतिवृष्टि हुई कि जनजीवन प्रभावित रहा। कई में अनियमित बारिश भी हुई। जैसे कभी तेज बारिश तो कभी लंबा ब्रेक। इस वजह से हालात ठीक नहीं है।

पहले 8 से 10 दिन लगातार बारिश होती थी, लेकिन इस बार अधिकतम दो दिन तक ही लगातार पानी गिरा। पहले बंगाल की खाड़ी से डिप्रेशन, लो प्रेशर एरिया (निम्न दाब क्षेत्र) से एक्टिव होते थे और सागर क्षेत्र से होते हुए प्रदेश के कई हिस्सों में गुजरते थे। इससे अति भारी या भारी बारिश होती थी। इस बार सिस्टम इतने मजबूत नहीं रहे।

मानसूनी सीजन में भी प्रदेश के पश्चिमी हिस्से में दिन में गर्म रहे। बारिश के अंतराल की वजह से जमीन सूखने लगी। इस वजह से पानी जमीन के अंदर नहीं उतरा। वर्तमान में तेज धूप है और जमीन सूख रही है। इससे कुछ दिनों के बाद ही भू-जल स्तर नीचे जाने लगेगा।

माइक्रो लेवल पर काम करने की जरूरत
विशेषज्ञ नायक कहते हैं कि जिन जिलों में 20 प्रतिशत या इससे कम पानी गिरा है, वहां पर सरकार को माइक्रो लेवल पर काम करने की जरूरत है। जब किसी इलाके में 26 प्रतिशत या उससे कम बारिश होती है तो वह इलाका सूखा घोषित होता है। इस बार सूखे के दायरे में आने वाले कई जिले हैं। यहां पर सरकार सर्वे कराकर पेयजल की स्थिति का आकलन लगाए।

शहरों में जल संकट की आशंका
भोपाल: सामान्य से 9 फीसदी अधिक (41 इंच से ज्यादा) बारिश दर्ज की गई। बड़ा तालाब, भदभदा और कलियासोत डैम फुल हो चुके हैं, हालांकि केरवा और कोलार में पानी की कमी है।

इंदौर: सामान्य से 27 प्रतिशत कम (लगभग 9.5 इंच कम) बारिश हुई है। शहर की जल आपूर्ति मुख्य रूप से नर्मदा, यशवंत सागर और बिलावली तालाब पर निर्भर है।
उज्जैन: गंभीर डैम इस मानसूनी सीजन में पूरा नहीं भर सका, जिससे शहर में पेयजल समस्या गहरा सकती है।