भिलाई.

देश की प्रतिष्ठित महारत्न सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी सेल में सामने आई कथित स्टील आपूर्ति अनियमितता अब बड़े घोटाले का रूप ले चुकी है। लोकपाल के स्पष्ट निर्देश के बाद सीबीआइ ने जांच का दायरा बढ़ा दिया है, जिससे अब कंपनी के शीर्ष प्रबंधन और पूर्व निदेशकों तक जांच की आंच पहुंच गई है।

प्रारंभिक आकलन के अनुसार, इस पूरे प्रकरण में सेल को लगभग 300 से 350 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। बीएसपी में तैयार टीएमटी स्टील की बड़ी मात्रा भी कथित तौर पर फर्जी या गैर-पात्र प्रोजेक्ट कंपनियों को सप्लाई की गई। इससे संकेत मिलता है कि अनियमितता केवल एक इकाई तक सीमित न रहकर पूरे नेटवर्क में फैली हुई थी।

1.5 लाख टन स्टील से खुला घोटाले का राज
जांच की शुरुआत तब हुई जब यह सामने आया कि वेंकटेश इंफ्रा प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को प्रोजेक्ट वर्क्स स्कीम के तहत 1.5 लाख टन से अधिक स्टील की आपूर्ति की गई, जबकि कंपनी इस योजना के लिए पात्र ही नहीं थी। लोकपाल ने 10 जनवरी 2024 को सीबीआइ जांच के आदेश दिए, जिसके बाद एजेंसी ने 10 अक्टूबर 2024 को एफआइआर दर्ज कर मामले की औपचारिक जांच शुरू की।

29 वरिष्ठ अधिकारी निलंबित, फिर बहाली पर उठे सवाल
लोकपाल के आदेश के बाद सेल प्रबंधन ने 29 वरिष्ठ अधिकारियों को निलंबित किया था, जिनमें निदेशक स्तर के दो अधिकारी भी शामिल थे। हालांकि, 28 जून 2024 को जांच में देरी का हवाला देकर सभी अधिकारियों की बहाली कर दी गई। इस निर्णय ने पारदर्शिता और निष्पक्षता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 35 निजी कंपनियां जांच के घेरे में जांच में यह भी सामने आया है कि वेंकटेश इंफ्रा के अलावा 35 से अधिक निजी कंपनियों को नियमों को दरकिनार कर स्टील सप्लाई की गई। इनमें इंफ्रास्ट्रक्चर, रियल एस्टेट और गैर-प्रोजेक्ट सेक्टर की कंपनियां शामिल हैं, जिन्हें इस स्कीम का लाभ मिलना ही नहीं चाहिए था। इन कंपनियों में कई नाम शामिल हैं, जैसे ब्रिक टू वाल इंफ्राटेक, ओएफबी टेक, लैंडसिएर्ज स्टेट, नोबेल टेक इंडस्ट्रीज, आर्टिस्टी इंफ्राकॉन, स्ट्राइक इंफ्राकान, जारैली प्रोजेक्ट्स, श्री सिद्धबाली इस्पात, एसएमडब्ल्यू इस्पात, रुद्रनाथ इंफ्रा, रेनबो वाणिज्य, सिल्वर वाटर मेटल एंड मिनरल्स, पीवीवी इंफ्रा लिमिटेड सहित अन्य।

व्हिसलब्लोअर को ही चुकानी पड़ी कीमत
इस पूरे मामले को उजागर करने वाले व्हिसलब्लोअर राजीव भाटिया बताए जा रहे हैं। उन्होंने पहले भी स्टील आपूर्ति में गड़बड़ी को लेकर उच्च स्तर पर शिकायत की थी। लेकिन कार्रवाई भ्रष्टाचार पर होने के बजाय, उन्हें 11 फरवरी 2025 को सीसीएस नियम 56(जे) के तहत समयपूर्व सेवानिवृत्त कर दिया गया। अंदरूनी सूत्रों के मुताबिक, भाटिया को एक ईमानदार और निर्भीक अधिकारी माना जाता था। उनकी बर्खास्तगी को लेकर उच्च स्तर तक असंतोष की चर्चाएं हैं।

सीएमडी पर भी उठे सवाल, इस्तीफे की अटकलें
जांच से जुड़े सूत्रों का दावा है कि सेल के वर्तमान सीएमडी अमरेंदु प्रकाश भी जांच के दायरे में हैं। आरोप है कि अनियमितताओं की जानकारी होने के बावजूद कई कंपनियों को स्टील आपूर्ति की अनुमति दी गई। प्रशासनिक हलकों में उनके इस्तीफे को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं, हालांकि आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।

सरकारी धन से कानूनी खर्च पर विवाद
एक और बड़ा विवाद इस बात को लेकर खड़ा हुआ है कि सीबीआइ जांच का सामना कर रहे अधिकारियों की कानूनी लड़ाई के लिए सेल द्वारा करीब 70 लाख रुपये अधिवक्ताओं की फीस में खर्च किए गए। अब मांग उठ रही है कि यह राशि संबंधित अधिकारियों से व्यक्तिगत रूप से वसूली जाए।

सबसे बड़ा सवाल, क्या होगी कार्रवाई?
पूरे मामले ने सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब देखना होगा कि क्या इस कथित स्टील घोटाले में जिम्मेदार अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होती है या फिर मामला अन्य मामलों की तरह फाइलों में ही दबकर रह जाता है।