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  • हरियाणा में सनसनीखेज वारदात, दुकान में झाड़ू लगा रहे युवक की रॉड मारकर हत्या

    हरियाणा में सनसनीखेज वारदात, दुकान में झाड़ू लगा रहे युवक की रॉड मारकर हत्या

    करनाल.

    करनाल के घरौंडा में एक युवक के सिर में रॉड से हमला कर हत्या कर दी गई। आरोपित ने दुकान पर सफाई कर रहे युवक के सिर में 9 बार हमला किया, इससे युवक की मौके पर ही मौत हो गई। आरोपित ने बाद में भागने की कोशिश की, लेकिन बाहर खड़े लोगों ने उसको पकड़ लिया और उसके पिटाई की।

    बाद में आरोपित को पुलिस के हवाले कर दिया गया। वारदात शुक्रवार सुबह की है। पूरी वारदात दुकान में लगे सीसीटीवी कैमरे में कैद हो गई है। बालीनगर निवासी 30 वर्षीय तेजबीर सिंह पुत्र सुभाष एक दुकान पर नौकरी करता था। सुबह वह दुकान पर सफाई कर रहा था। इसी दौरान आरोपित नेपाल निवासी उत्तम कुमार वहां पर आया और रॉड से हमला शुरू कर दी।

    तेजबीर गिर गया और लगातार उसके सिर पर 9 बार रॉड से हमला किया। वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपित ने भागने की कोशिश की, लेकिन बाहर खड़े लोगों ने उसको पकड़ा लिया और उसके साथ मारपीट की। बाद में पुलिस को बुलाया गया। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम हाउस में रखवा दिया है। पुलिस परिजनों की शिकायत पर केस दर्ज करने में जुटी है।

  • बिना गैस-बिजली के तैयार होता है असम का ‘मैजिक राइस’, जानें क्यों खास है ये चावल

    बिना गैस-बिजली के तैयार होता है असम का ‘मैजिक राइस’, जानें क्यों खास है ये चावल

    चावल का नाम सुनते ही दिमाग में सबसे पहले उसे बनाने का लंबा प्रोसेस आता है. चावल बनाने के लिए सबसे पहले उसे भिगोना पड़ता है. फिर पानी उबालिए, चावल डालिए और कुछ देर इंतजार करने के बाद ही खाना तैयार होता है. लेकिन क्या आपने कभी ऐसे चावल के बारे में सुना है, जिसे पकाने के लिए न गैस जलानी पड़ती है, न कुकर की जरूरत होती है और न ही बिजली खर्च होती है? सुनने में ये किसी जादू से कम नहीं लगता, लेकिन असम में चावल की एक ऐसी खास किस्म मिलती है, जिसे ट्रेडिशनल तरीके से बिना पकाए भी खाने लायक बनाया जा सकता है.

    इस चावल को तैयार करने के लिए बस इसे पानी में कुछ देर भिगोना होता है. पानी सोखने के बाद इसके दाने सॉफ्ट हो जाते हैं और इन्हें सीधे खाया जा सकता है. यही अनोखी खासियत इस चावल को नॉर्मल चावल से बिल्कुल अलग बनाती है. यही वजह है कि इसे 'मैजिक राइस' यानी 'जादुई चावल' के नाम से भी जाना जाता है. खास बात यह है कि यह कोई नई खोज नहीं, बल्कि असम में मिलने वाले चावलों की पुरानी और ट्रेडिशनल किस्म है, जिसे वहां लंबे समय से खाया जाता रहा है. अब सवाल ये है कि आखिर ऐसा क्या खास है इस चावल में, जो बिना उबाले ही पानी में भिगोने से तैयार हो जाता है? और इसे खाने का तरीका क्या है? आइए जानते हैं असम के इस अनोखे 'मैजिक राइस' की पूरी कहानी.

    चावल पकाने की जरूरत ही नहीं
    असम की इस खास किस्म को कोमल साउल या चोकुवा चावल के नाम से जाना जाता है. इसकी सबसे बड़ी खासियत इसे बनाने का तरीका है. इसे बनाने के लिए सिर्फ 'सोखो और खाओ' वाला तरीका अपनाने होता है. यानी नॉर्मल चावल की तरह इसे उबालने की जरूरत नहीं पड़ती. पानी में भिगोने के बाद इसके दाने सॉफ्ट होकर खाने लायक हो जाते हैं. यही वजह है कि इसे 'मैजिक राइस' यानी जादुई चावल भी कहा जाता है.

    ठंडे पानी में भी हो जाता है तैयार
    इस चावल की दूसरी सबसे बड़ी खासियत ये है कि इसे तैयार करने के लिए उबलते पानी की जरूरत नहीं होती है. इसे तैयार करने के लिए ठंडे या हल्के गुनगुने पानी में भिगोया जाता है. कुछ किस्मों को ठंडे पानी में करीब 40-45 मिनट तक रखने से दाने सॉफ्ट हो जाते हैं, जबकि गुनगुने पानी में ये समय और कम हो सकता है. इसके बाद पानी निकालकर इसे सीधे खाया जा सकता है. यानी इसे पकाने के लिए न चूल्हे की जरूरत पड़ी, न बर्तन में उबालने का झंझट करना पड़ा और न ही लंबे समय तक इंतजार.

    आखिर बिना पकाए सॉफ्ट कैसे हो जाता है?
    अब सवाल उठता है कि आखिर चावल बिना पकाए तैयार कैसे हो जाता है? ऐसा इस चावल में पाए जाने वाले खास तरह के स्टार्च की वजह से होता है. चोकुवा चावल में एमाइलोज की मात्रा कम होती है. इसी वजह से पानी के कॉन्टैक्ट में आने पर इसके दाने जल्दी सॉफ्ट हो जाते हैं. यही गुण इसे बाकी नॉर्मल चावलों से अलग बनाता है.

    असम में लंबे समय से खाया जा रहा है
    ये कोई नया चावल नहीं है. असम में इसकी परंपरा काफी पुरानी है. यहां इसे अलग-अलग तरीकों से खाया जाता रहा है. इसे दही, दूध, गुड़, चीनी, केला, अचार या नमक-तेल जैसी चीजों के साथ भी खाया जाता है. कई जगहों पर इससे नाश्ता भी तैयार किया जाता है. ये दशकों से असम की खानपान की परंपरा हिस्सा रहा है.

    ट्रैवल करने वालों के लिए भी काम का
    ये चावल ट्रैवलर्स के लिए भी बहुत काम का साबित हो सकता है. सोचिए ऐसी जगह जहां गैस या बिजली की सुविधा न हो और फिर भी चावल खाना हो. ऐसे में ये चावल काफी काम आ सकता है. इसकी आसान तैयारी की वजह से इसे ट्रैवलर्स, पर्वतारोहियों और ऐसे लोगों के लिए बढ़िया आरामदायक भोजन माना गया है जिन्हें बिना खाना पकाने के लिए ज्यादा साधन नहीं मिलते हैं. इस चावल को सैनिक भी इस्तेमाल करते हैं.

    स्वाद में भी है खास
    पानी में भिगोने के बाद चावल सॉफ्ट और फूला हुआ हो जाता है. इसका स्वाद नॉर्मल चावल से थोड़ा अलग और हल्का मीठा बताया जाता है. इसी कारण इसे गुड़, दूध या दही के साथ खाने का चलन भी है.

    तो अगली बार जब आपको लगे कि चावल बनाने में काफी समय और मेहनत लगती है, तो असम के इस ट्रेडिशनल 'मैजिक राइस' के बारे में जरूर जानिए. सदियों पुरानी ये देसी तकनीक आज के समय में भी उतनी ही दिलचस्प लगती है, क्योंकि यहां चावल पकाने की नहीं, बस उसे सही तरीके से भिगोने की जरूरत पड़ती है.

  • नीम करोली बाबा के चमत्कारों का सच क्या था? ट्रेन से LSD तक, जानिए कहानियों के पीछे की हकीकत

    नीम करोली बाबा के चमत्कारों का सच क्या था? ट्रेन से LSD तक, जानिए कहानियों के पीछे की हकीकत

    नीम करोली बाबा का नाम आते ही लोगों के मन में सबसे पहले क्या आता है? एक साधारण सा दिखने वाला संत, कंधे पर कंबल और उनसे जुड़ी ऐसी कहानियां, जिन्हें सुनकर आज भी लोग हैरान रह जाते हैं. कहीं ट्रेन के रुक जाने की बात होती है, कहीं पानी के घी में बदलने का दावा मिलता है और कहीं उनके सामने एलएसडी का असर खत्म हो जाने की कहानी सुनाई जाती है. लेकिन इन घटनाओं की सच्चाई क्या है? क्या वाकई बाबा के पास कोई असाधारण शक्ति थी या फिर समय के साथ उनके भक्तों के अनुभव चमत्कारों की कहानियों में बदलते चले गए?

    दिलचस्प बात यह है कि इन सवालों का जवाब ढूंढते समय सबसे ज्यादा हैरानी बाबा के अपने रवैये से होती है. क्योंकि जिनके नाम पर इतने चमत्कारों की कहानियां सुनाई जाती हैं, वही नीम करोली बाबा खुद चमत्कारों को कोई बड़ी बात मानने से बचते थे.

    ट्रेन रोकने से पानी को घी बनाने तक, क्या थे बाबा के चमत्कार?
    नीम करोली बाबा से जुड़े कई किस्से आज भी उनके भक्तों के बीच सुनाए जाते हैं. सबसे चर्चित घटनाओं में ट्रेन रुकने वाली कहानी भी शामिल है. कहा जाता है कि एक बार बाबा को ट्रेन में बैठाने के लिए रेलवे कर्मचारी उन्हें अंदर नहीं जाने दे रहे थे. इसके बाद ट्रेन आगे नहीं बढ़ी. जब बाबा को ट्रेन में बैठाया गया तो ट्रेन चल पड़ी. ऐसी ही एक कहानी पानी के घी में बदल जाने की भी कही जाती है. वहीं अमेरिकी आध्यात्मिक शिक्षक रामदास से जुड़ा एक चर्चित किस्सा एलएसडी को लेकर भी बताया जाता है.

    बाबा से जुड़ी ज्यादातर कहानियां आखिर आई कहां से?
    नीम करोली बाबा ने खुद अपने जीवन के चमत्कारों की कोई किताब नहीं लिखी थी. उनके बारे में जो सामग्री सामने आती है, उसमें बड़ी भूमिका उन लोगों की है, जो उनसे मिले, उनके साथ रहे या उनके भक्त बने. रामदास की किताब Miracle of Love में बाबा से जुड़े कई अनुभव और प्रसंग मिलते हैं. इनमें बड़ी संख्या ऐसे किस्सों की है, जिन्हें लोगों ने अपने अनुभव के तौर पर साझा किया.

    यही वजह है कि बाबा से जुड़ी कहानियों को समझते समय दो पहलू सामने आते हैं. पहला, वह व्यक्ति जिसने किसी घटना को अपनी आंखों से देखा या महसूस किया और उसे चमत्कार माना. दूसरा, वह व्यक्ति जो उस घटना के पीछे किसी सामान्य वजह की तलाश करता है. मसलन, अगर कोई भक्त कहता है कि बाबा की वजह से उसकी जिंदगी बदल गई, तो उसके लिए वह अनुभव बिल्कुल वास्तविक है. लेकिन इसे वैज्ञानिक रूप से चमत्कार साबित करने के लिए अलग तरह के प्रमाण की जरूरत होगी.

    क्या समय के साथ बढ़ती गईं चमत्कारों की कहानियां?
    बाबा के निधन के बाद उनके बारे में कहानियां अलग-अलग लोगों तक पहुंचती रहीं. किसी ने अपनी मुलाकात का अनुभव सुनाया, किसी ने किसी घटना को याद किया और किसी ने बाबा के साथ हुई बातचीत को जीवन बदल देने वाला बताया. ऐसे में यह संभावना भी उठती है कि वर्षों तक सुनाई जाती रहीं कहानियों में कुछ बातें जुड़ती या बदलती गई हों.

    हालांकि इसका मतलब यह भी नहीं है कि हर अनुभव झूठा था. किसी व्यक्ति के लिए आध्यात्मिक अनुभव बेहद निजी हो सकता है. वह उसे जिस तरह महसूस करता है, उसी तरह बयान करता है. यही कारण है कि नीम करोली बाबा की कहानी में आस्था और तर्क दोनों के लिए जगह बनी हुई है.

    लेकिन, बाबा खुद चमत्कारों के बारे में क्या कहते थे? यह शायद इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा है.

    जिन बाबा के नाम पर इतने चमत्कारों की बातें होती हैं, वह खुद इन दावों से दूरी बनाए रखते थे. भक्त जब उन्हें असाधारण शक्ति वाला संत मानते या उनकी पूजा करने की बात करते, तो बाबा उन्हें अपनी तरफ देखने के बजाय हनुमान जी की भक्ति करने की सलाह देते थे. उनका संदेश सीधा था कि अगर आस्था रखनी है तो भगवान हनुमान में रखो, किसी इंसान को उसका केंद्र मत बनाओ.

    बाबा तस्वीरों से भी क्यों बचते थे?
    नीम करोली बाबा के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह अपनी तस्वीरें खिंचवाने से बचते थे. उनके लिए बाहरी पहचान से ज्यादा महत्व भक्ति और सेवा का था. उन्होंने अपने बाद किसी व्यक्ति को उत्तराधिकारी घोषित करके अपनी गद्दी नहीं सौंपी. उनके जाने के बाद भी उनके नाम पर कोई ऐसा केंद्रीय धार्मिक ढांचा नहीं बना, जैसा कई दूसरे संतों के साथ देखने को मिलता है. शायद यही वजह है कि बाबा की लोकप्रियता उनके जाने के बाद किसी प्रचार अभियान से नहीं, बल्कि उनके भक्तों की यादों और अनुभवों के जरिए बढ़ती गई.

    सितंबर 1973 में क्या हुआ था?
    नीम करोली बाबा के जीवन का आखिरी अध्याय सितंबर 1973 में जुड़ा है. बताया जाता है कि वह आगरा में एक हृदय रोग विशेषज्ञ से मिलने के बाद ट्रेन से कैंची लौट रहे थे. रास्ते में उनकी तबीयत बिगड़ गई. इसके बाद वह मथुरा में ट्रेन से उतर गए और अपने साथ मौजूद लोगों से वृंदावन ले जाने के लिए कहा. उन्हें अस्पताल ले जाया गया. वहां इलाज की कोशिश की गई, लेकिन भक्तों के अनुसार बाबा ने ऑक्सीजन लेने से भी इनकार कर दिया. 11 सितंबर 1973 को वृंदावन में उनका निधन हो गया. उनके आखिरी समय से जुड़े कई प्रसंग भी भक्तों के बीच सुनाए जाते हैं. इन्हीं में 'जय जगदीश हरे' का जिक्र भी मिलता है. बाबा का शरीर चला गया, लेकिन उनके नाम से जुड़ी कहानियां इसके बाद और तेजी से फैलती चली गईं.

    बाबा के जाने के बाद कैंची धाम क्यों बन गया आस्था का बड़ा केंद्र?
    आज कैंची धाम सिर्फ एक आश्रम या मंदिर परिसर का नाम नहीं है. यह देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए एक प्रमुख आध्यात्मिक स्थल बन चुका है. बाबा के जीवन से जुड़े किस्सों के साथ-साथ उन लोगों की कहानियां भी यहां की लोकप्रियता का हिस्सा बनीं, जिन्होंने बाबा या कैंची धाम से किसी तरह का आध्यात्मिक जुड़ाव महसूस किया. समय के साथ विदेशी यात्रियों और चर्चित हस्तियों के कैंची धाम पहुंचने की बातें भी सामने आती रहीं. इससे बाबा की कहानी भारत से बाहर भी ज्यादा लोगों तक पहुंची.

    स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग का कैंची धाम से क्या कनेक्शन है?
    नीम करोली बाबा से जुड़ी सबसे चर्चित आधुनिक कहानियों में स्टीव जॉब्स और मार्क जुकरबर्ग का नाम भी लिया जाता है. यहां एक जरूरी तथ्य समझना जरूरी है. स्टीव जॉब्स की भारत यात्रा बाबा के निधन के बाद हुई थी. यानी जॉब्स की बाबा से व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई थी. लेकिन उनकी भारत यात्रा और आध्यात्मिक खोज को कैंची धाम से जोड़ा जाता है.

    बाद में फेसबुक के संस्थापक मार्क जुकरबर्ग ने भी भारत यात्रा के दौरान कैंची धाम जाने का अनुभव साझा किया था. उन्होंने बताया था कि उनके मेंटर स्टीव जॉब्स ने उन्हें भारत आने और एक ऐसे मंदिर में जाने की सलाह दी थी, जहां वह खुद जा चुके थे. जुकरबर्ग के मुताबिक उस यात्रा ने उन्हें अपने जीवन और फेसबुक को लेकर दिशा समझने में मदद की.

    इस कहानी ने नीम करोली बाबा और कैंची धाम को दुनिया भर में चर्चा में ला दिया. हालांकि यहां भी यह साफ समझना जरूरी है कि जुकरबर्ग और जॉब्स के अनुभवों को बाबा के प्रत्यक्ष चमत्कार का प्रमाण नहीं माना जा सकता. ये उनके व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभवों से जुड़े प्रसंग हैं.

    तो क्या नीम करोली बाबा के चमत्कार सच थे?
    इस सवाल का सबसे ईमानदार जवाब यही है कि सभी चमत्कारों को साबित करने वाला स्वतंत्र और वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. कुछ घटनाएं भक्तों की गवाही और व्यक्तिगत अनुभवों पर आधारित हैं. उनके लिए वह अनुभव बिल्कुल वास्तविक था. लेकिन किसी अनुभव का वास्तविक महसूस होना और किसी अलौकिक घटना का वैज्ञानिक रूप से सिद्ध होना, दोनों अलग बातें हैं.

    ट्रेन रुकने की कहानी हो, पानी के घी में बदलने का दावा हो या किसी व्यक्ति की जिंदगी अचानक बदल जाने का अनुभव- हर घटना को उसी के संदर्भ में देखना जरूरी है. हो सकता है किसी घटना के पीछे कोई सामान्य कारण रहा हो. यह भी संभव है कि किसी व्यक्ति ने उसे अपने आध्यात्मिक विश्वास के नजरिए से देखा हो.

  • बहबल कलां गोलीकांड: सुखबीर बादल आज फिर SIT के सामने होंगे पेश, होगी पूछताछ

    बहबल कलां गोलीकांड: सुखबीर बादल आज फिर SIT के सामने होंगे पेश, होगी पूछताछ

    चंडीगढ़.

    बहबल कलां गोलीकांड मामले में शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष सुखबीर सिंह बादल आज चंडीगढ़ में विशेष जांच दल (SIT) के सामने पेश होंगे। वर्ष 2015 में बरगाड़ी में श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी की घटनाओं के बाद हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान बहबल कलां में पुलिस फायरिंग हुई थी।

    कृष्ण भगवान सिंह और गुरजीत सिंह की इस घटना के दौरान मौत हो गई थी। इस घटना के बाद पंजाब की राजनीति में काफी विवाद हुआ और पुलिस कार्रवाई को लेकर कई सवाल उठे। मामले की जांच अलग-अलग समय पर विभिन्न जांच दलों और आयोगों ने की। बाद में पंजाब पुलिस के विशेष जांच दल ने भी इसकी जांच शुरू की।

    सुखबीर बादल की भूमिका पर सवाल
    जांच में उस समय के पुलिस प्रशासन से जुड़े फैसलों और तत्कालीन उपमुख्यमंत्री एवं गृह विभाग संभाल रहे सुखबीर बादल की भूमिका को लेकर भी सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी अदालत में साबित होना अलग कानूनी प्रक्रिया है।

    20 जुलाई को हुई थी पूछताछ
    इससे पहले 20 जुलाई 2026 को सुखबीर बादल चंडीगढ़ में एसआइटी के सामने पेश हुए थे। उनसे करीब दो घंटे तक पूछताछ की गई थी। पूछताछ के बाद सुखबीर बादल ने जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित कार्रवाई बताया था। इसके बाद एसआइटी ने उन्हें दोबारा पूछताछ के लिए 11 सितंबर को पेश होने का समन भेजा। जानकारी अनुसार एसआइटी के सामने उनकी पांचवीं पेशी होगी। इस दौरान उनसे वर्ष 2015 की घटनाओं, पुलिस कार्रवाई और उस समय लिए गए फैसलों से जुड़े सवाल पूछे जाने की संभावना है।

  • सिर्फ 2 करोड़ के बजट में बनी ‘हनुमान अंश’ ने मचाया तहलका, 160 करोड़ के पार पहुंची कमाई

    सिर्फ 2 करोड़ के बजट में बनी ‘हनुमान अंश’ ने मचाया तहलका, 160 करोड़ के पार पहुंची कमाई

    बॉक्स ऑफिस पर आए दिन नए-नए रिकॉर्ड बनते और टूटते रहते हैं, लेकिन जब कोई बिना किसी शोर-शराबे और तामझाम के आई फिल्म इतिहास रच दे, तो हर कोई हैरान रह जाता है. आध्यात्मिक गुरु नीम करौली बाबा के जीवन पर आधारित फिल्म 'हनुमान अंश' इन दिनों देशभर के सिनेमाघरों में धूम मचा रही है. 7 अगस्त को बिना किसी बड़े प्रचार-प्रसार के रिलीज हुई इस धार्मिक फिल्म ने उत्तर और पश्चिम भारत के दर्शकों को खींचकर थिएटर्स तक ला खड़ा किया है.

    जहां एक ओर यश की बड़े बजट वाली फिल्म 'टॉक्सिक: ए फेयरी टेल फॉर ग्रोन-अप्स' दर्शकों की उम्मीदों पर खरी नहीं उतर सकी, वहीं महज 2 करोड़ रुपये के बजट में बनी 'हनुमान अंश' ने 160 करोड़ रुपये से ज्यादा का शानदार कारोबार कर लिया है. अब सवाल ये उठता है कि फिल्म इंडस्ट्री से बाहर के लोगों और बाबा के भक्तों द्वारा बनाई गई यह छोटी सी फिल्म आखिर लोगों के दिलों को इतना कैसे छू रही है, क्या इसके पीछे कोई चमत्कार है या कोई और कारण?

    नीम करोली बाबा पर बनी फिल्म
    विशाल चतुर्वेदी के लेखन और निर्देशन में बनी यह फिल्म लक्ष्मी नारायण शर्मा, जिन्हें दुनिया नीम करौली बाबा के नाम से जानती है, के जीवन को बेहद सादगी के साथ प्रस्तुत करती है. फिल्म दर्शकों को उनके बचपन के दिनों में ले जाती है, जब मात्र 12 साल की उम्र में उन्होंने ध्यान लगाना और साधु का जीवन अपनाना शुरू कर दिया था. इसके बाद उनकी अध्यात्म यात्रा और भविष्य देखने की दिव्य शक्तियों से लेकर उनकी बढ़ती प्रसिद्धि तक के हर पहलू को बहुत सुंदर तरीके से दिखाया गया है.

    फिल्म का मुख्य फोकस नीम करौली बाबा के जीवन की उन महत्वपूर्ण घटनाओं पर है, जो उनके चमत्कारों और आम लोगों के जीवन पर पड़े सकारात्मक प्रभाव से जुड़ी हैं. फिल्म कहीं से भी किसी संत की जीवनी को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करती हुई नजर नहीं आती. मेकर्स का मकसद किसी बड़े तकनीकी सिनेमा से चौंकाना नहीं, बल्कि बाबा की महान शख्सियत से लोगों को रूबरू कराना है. ठीक बाबा की जिंदगी की तरह इस फिल्म की सबसे बड़ी खूबी भी इसकी सादगी ही है.

    फिल्म के एक्टर का कमाल काम
    फिल्म का मूल उद्देश्य दर्शकों को गुरु की शिक्षाओं और उनकी आध्यात्मिक शक्तियों का अहसास कराना है. मुख्य किरदार में नए कलाकार शोभिनव सत्या ने कमाल का काम किया है. उन्होंने एक ऐसे साधु का किरदार निभाया है जो हर मुश्किल, अपमान या कठिन परिस्थिति में भी मुस्कुराता रहता है. ठीक वैसे, जैसे रामायण में अरुण गोविल राम के किरदार में दिखाई दिए थे. बिना किसी दिखावे और सीधे-सादे अंदाज में बनी इस फिल्म को देखकर बाबा के पुराने भक्त तो खुश हो ही रहे हैं, साथ ही नए दर्शक भी उनके जीवन और विचारों से गहराई से जुड़ रहे हैं.

    सिनेमा की दुनिया में एक अलग पहचान
    रजनीश (ओशो) पर बनी अमेरिकी डॉक्यूमेंट्री 'वाइल्ड वाइल्ड कंट्री', वेब सीरीज 'आश्रम' या 'MSG: द मैसेंजर ऑफ गॉड' जैसी फिल्मों की भीड़ के बीच 'हनुमान अंश' एक बिल्कुल अलग एक्सपीरियंस देती है. यह किसी कमर्शियल सुपरहीरो की तरह मुख्य किरदार को महिमामंडित नहीं करती, बल्कि एक आम इंसान की अंदरूनी अच्छाई और मूल्यों पर भरोसा जताती है. यही वजह है कि एक साधारण जीवन जीने वाले संत की यह कहानी आज करोड़ों लोगों के दिलों में उतर चुकी है.

    क्या सिनेमा जगत में शुरू होगा नया दौर?
    फिल्म की इस अभूतपूर्व सफलता को देखकर अब यह बड़ा सवाल उठने लगा है कि क्या आने वाले समय में दूसरे आध्यात्मिक गुरुओं पर भी फिल्में बनाने का एक नया ट्रेंड शुरू होगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल देश का दर्शक नीम करौली बाबा की सादगी और शिक्षाओं के प्रभाव में पूरी तरह से लीन नजर आ रहा है.

    खैर, ताज्जुब की बात तो यह है कि अपने पांचवें हफ्ते में ही फिल्म ने अकेले 55 करोड़ रुपये कमा डाले हैं, जो भारतीय सिनेमा में अपने आप में एक अनोखा रिकॉर्ड है. धार्मिक लोग इसे हनुमान जी का चमत्कार मान रहे हैं, जबकि कुछ लोग इसे इस तरह से भी देख रहे है कि हाल फिलहाल में रिलीज हुई फिल्मों का कंटेंट कमजोर है, ये ही वजह है कि दर्शक हनुमान अंश की तरफ पहुंचे. बाकी काम सोशल मीडिया के प्रचार-प्रसार, नेताओं-अभिनेताओं की तारीफों ने पूरा कर दिया.

  • घर में उगाएं रीठे का पौधा, बालों से लेकर कपड़ों की सफाई तक आएगा काम

    घर में उगाएं रीठे का पौधा, बालों से लेकर कपड़ों की सफाई तक आएगा काम

     आजकल नेचुरल चीजों का क्रेज लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा है. फिर चाहे वो साबुन हो या हेयर कलर, लोग नेचुरल उपाय ही अपना रहे हैं. ज्यादातर लोग बाजार में मिलने वाली केमिकल युक्त चीजों से दूरी बनाकर नेचुरल और इको-फ्रेंडली चीजों की तरफ लौट रहे हैं. ऐसे में पुरानी देसी चीजें एक बार फिर चर्चा में हैं. इन्हीं देसी चीजों में रीठा भी शामिल है. पुराने जमाने में रीठा को बाल धोने से लेकर कपड़े साफ करने तक के लिए इस्तेमाल किया जाता था.

    ऐसे में लोग आजकल बाल धोने के लिए बाजार से रीठा खरीदकर ला रहे हैं. क्या आप भी उन्हीं में शामिल हैं? अगर हां, तो अब आपको ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी. दरअसल, रीठा को आप अपने घर पर आसानी से उगा सकते हैं. जी हां, रीठा का पौधा होता है, जो छोटे से गमले में भी बहुत ही आसानी से उग जाता है. इसके फल में मौजूद नेचुरल सैपोनिन पानी के संपर्क में आने पर झाग बनाते हैं, जिसकी वजह से ये नेचुरल क्लीनजर की तरह काम करता है.

    रीठा आखिर इतना खास क्यों है?
    रीठे को आमतौर पर सोपनट या सोपबेरी भी कहा जाता है. इसके फल का बाहरी छिलका सैपोनिन से भरपूर होता है. यही नेचुरल तत्व पानी में मिलकर साबुन जैसा झाग बनाता है और गंदगी व तेल को हटाने में मदद करता है. इसलिए पुराने समय में रीठे का इस्तेमाल बाल, स्किन और कपड़े साफ करने के लिए किया जाता था.

    घर में रीठे का पौधा कैसे लगाएं?
    रीठे को बीज से उगाया जा सकता है. इसके लिए पका हुआ रीठा लेकर उसके बीज को निकालकर अच्छी तरह साफ करें. बीजों को कुछ दिन सुखाने के बाद मिट्टी में लगाया जा सकता है. असम फॉरेस्ट डिपार्टमेंट की नर्सरी गाइड के मुताबिक, रीठा के पके बीजों को 2-3 दिन धूप में सुखाकर बोया जा सकता है.

    रीठा के बीजों को अंकुरित होने में करीब 30-40 दिन लग सकते हैं. अगर आप शुरुआत कर रहे हैं, तो पहले इसे छोटे गमले या कंटेनर में पौधे की तरह तैयार कर सकते हैं. लेकिन ध्यान रखें कि रीठा आगे चलकर बड़ा पेड़ बनता है, इसलिए लंबे समय के लिए इसे खुली जगह देना जरूरी है.

    कैसी मिट्टी और कितनी धूप चाहिए?
    रीठा के पौधे को ऐसी मिट्टी पसंद होती है जिसमें पानी जमा न हो. इसलिए इसे ऐसी मिट्टी में बोएं, जिसमें पानी जमा ना हो. पौधा लगाने के लिए नॉर्मल गार्डन वाली मिट्टी में ऑर्गेनिक खाद या कंपोस्ट मिलाया जा सकता है.

    रीठे के पौधे को अच्छी ग्रोथ के लिए अच्छी धूप भी चाहिए. पौधा बड़ा होने के बाद ये कम देखभाल में भी बढ़ सकता है, लेकिन शुरुआती दिनों में पानी और मिट्टी की नमी पर ध्यान देना जरूरी है.

    पानी देते समय सबसे बड़ी गलती न करें
    रीठा के छोटे पौधे को जरूरत के हिसाब से पानी दें, लेकिन गमले या मिट्टी में पानी जमा न रहने दें. लगातार गीली मिट्टी जड़ों को नुकसान हो सकता है. खासकर बारिश के मौसम में ये ध्यान रखना ज्यादा जरूरी है कि एक्स्ट्रा पानी आसानी से बाहर निकल जाए.

    रीठा के फल से बनाएं नेचुरल क्लीनर
    जब पेड़ पर रीठा के फल आते हैं और पककर सूखने लगते हैं, तो इन्हें इकट्ठा करके सुखाया जा सकता है. इसके बाद रीठे के छिलके को पानी में भिगोकर या उबालकर उसका नेचुरल क्लीनिंग लिक्विड तैयार किया जाता है.

    रीठे के छिलके में मौजूद सैपोनिन पानी में झाग पैदा करता है. यही वजह है कि रीठे का इस्तेमाल नेचुरल तरीके से शैंपू और क्लीनजर के तौर पर होता रहा है.

    बाल धोने में भी होता है इस्तेमाल
    रीठा लंबे समय से बालों की सफाई के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है. इसके छिलकों को पानी में भिगोकर या उबालकर छान लिया जाता है और उस पानी का इस्तेमाल बाल साफ करने के लिए किया जाता है. आज भी कई हर्बल हेयर-क्लीनिंग प्रोडक्ट्स में रीठा का इस्तेमाल किया जाता है. हालांकि, पहली बार इस्तेमाल करने से पहले थोड़ी मात्रा में टेस्ट करना बेहतर है और इसे आंखों से दूर रखना चाहिए.

    कपड़े और घर की सफाई में भी आ सकता है काम
    रीठा का इस्तेमाल सिर्फ बाल धोने के लिए ही नहीं किया जाता है. इसके नेतुरल सैपोनिन की वजह से इसे कपड़े और कुछ घरेलू चीजों की सफाई में भी इस्तेमाल किया जाता है. इसीलिए इसे एक तरह का पौधे से मिलने वाला नेचुरल क्लीनजर कहा जा सकता है. यानी घर में रीठे का पेड़ लगाने का मतलब सिर्फ एक पौधा लगाना नहीं, बल्कि ऐसा पेड़ तैयार करना है जिसके फल आगे चलकर कई तरह की सफाई में काम आ सकते हैं.

  • पंजाब में BJP की नशामुक्त यात्रा को धार, पूनिया ने कार्यकर्ताओं संग की बैठक; संगठन मजबूती पर मंथन

    पंजाब में BJP की नशामुक्त यात्रा को धार, पूनिया ने कार्यकर्ताओं संग की बैठक; संगठन मजबूती पर मंथन

    चंडीगढ़

    पंजाब भाजपा के नए प्रभारी एवं राष्ट्रीय महासचिव डॉ. सतीश पूनिया ने गुरुवार को पार्टी नेताओं के साथ प्रस्तावित ‘नशामुक्त पंजाब यात्रा’ की तैयारियों को लेकर बैठक की। बैठक में यात्रा के आयोजन और इसकी रूपरेखा के साथ पंजाब में संगठन को और मजबूत करने को लेकर चर्चा हुई। पूनिया ने पार्टी की चुनावी तैयारियों को गति देने और संगठन को जमीनी स्तर तक मजबूत करने पर जोर दिया।

    बैठक में पंजाब के सह-प्रभारी डॉ. नरेंद्र रैना और प्रदेश महासचिव (संगठन) मंत्री श्रीनिवासुलु समेत पार्टी के वरिष्ठ नेता मौजूद रहे। बैठक के दौरान पंजाब से जुड़े राजनीतिक और संगठनात्मक विषयों पर भी विचार-विमर्श किया गया।

    117 सीटों पर चुनाव लड़ने का दावा
    पूनिया के पंजाब प्रभारी बनने के बाद पार्टी ने राज्य में संगठन को मजबूत करने और आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों को तेज किया है। वह पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि भाजपा पंजाब की सभी 117 विधानसभा सीटों पर अपने दम पर चुनाव लड़ने की तैयारी कर रही है। साथ ही उन्होंने नशे को पंजाब के प्रमुख मुद्दों में शामिल करते हुए इसके खिलाफ पार्टी की ओर से एक सुव्यवस्थित अभियान चलाने की बात कही है।

    भाजपा की प्रस्तावित नशामुक्त पंजाब यात्रा को इसी अभियान की तैयारियों से जोड़कर देखा जा रहा है। पार्टी नेतृत्व का फोकस नशे के मुद्दे को चुनावी स्तर पर प्रमुखता से उठाने के साथ-साथ संगठन को मजबूत करने पर है। पूनिया ने हालिया बैठकों में बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने और पुराने अनुभवी नेताओं तथा नए कार्यकर्ताओं के बीच बेहतर समन्वय पर भी जोर दिया है।

    पूनिया के सामने पंजाब में भाजपा के संगठनात्मक विस्तार के साथ चुनावी आधार मजबूत करने की चुनौती है। ऐसे में नशामुक्त पंजाब यात्रा को लेकर हुई बैठक को पार्टी की आगामी राजनीतिक गतिविधियों की तैयारियों के लिहाज से अहम माना जा रहा है।  

  • रायपुर के स्पा सेंटर पर पुलिस का छापा, आपत्तिजनक सामग्री मिलने पर संचालक-मैनेजर पर केस

    रायपुर के स्पा सेंटर पर पुलिस का छापा, आपत्तिजनक सामग्री मिलने पर संचालक-मैनेजर पर केस

    रायपुर.

    राजधानी रायपुर के पंडरी स्थित श्याम स्क्वायर के इशवा लग्जरी स्पा सेंटर में पुलिस ने दबिश देकर कार्रवाई की है। पुलिस ने स्पा सेंटर की जांच के दौरान आपत्तिजनक सामग्री बरामद होने का दावा किया है। मामले में स्पा संचालक और मैनेजर के खिलाफ अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम (पीटा एक्ट) 1956 के तहत अपराध दर्ज किया गया है।

    पुलिस के मुताबिक, 10 सितंबर को एसीपी स्नेहिल साहू के नेतृत्व में थाना सिविल लाइन और देवेंद्र नगर पुलिस की संयुक्त टीम ने इशवा लग्जरी स्पा सेंटर में रेड की। जांच के दौरान पुलिस को आपत्तिजनक वस्तुएं मिलीं। पूछताछ में यह भी सामने आया कि स्पा सेंटर में अन्य राज्यों से युवतियों को बुलाकर देह व्यापार कराया जा रहा था।

    पुलिस के मुताबिक स्पा में काम करने वाली युवतियों ने पूछताछ के दौरान संचालक और मैनेजर पर जबरन देह व्यापार कराने के आरोप लगाए हैं। इसके बाद पुलिस ने स्पा संचालक हरविंदर सिंह ग्रोवर निवासी टिकरापारा और मैनेजर मुकेश कुमार वर्मा, निवासी भिलाई-3 के खिलाफ कार्रवाई की। पुलिस ने दोनों के खिलाफ थाना देवेंद्र नगर में मामला दर्ज किया है। मामले में आगे की जांच जारी है।

  • हर बात पर माफी मांगना जरूरी नहीं, चाणक्य नीति बताती है कब झुकना और कब आत्मसम्मान बचाना चाहिए

    हर बात पर माफी मांगना जरूरी नहीं, चाणक्य नीति बताती है कब झुकना और कब आत्मसम्मान बचाना चाहिए

    रिश्तों में मतभेद होना आम बात है, लेकिन हर विवाद में खुद को सही साबित करना समझदारी नहीं होती. कई बार अपनी गलती स्वीकार कर लेना रिश्ते को बचा सकता है, वहीं कुछ परिस्थितियों में बार-बार समझौता करना आपके आत्मसम्मान को नुकसान पहुंचा सकता है. आचार्य चाणक्य की नीतियों में भी व्यक्ति को परिस्थिति के अनुसार व्यवहार करने की सीख मिलती है.

    चाणक्य नीति के अनुसार समझदार व्यक्ति यह जानता है कि कब विनम्र होना है, कब अपनी गलती के लिए माफी मांगनी है और कब किसी व्यक्ति या परिस्थिति से दूरी बनाना ही बेहतर है. आइए जानते हैं किन परिस्थितियों में इन बातों का ध्यान रखना चाहिए.

    गलती हो तो माफी मांगने में देर न करें
    अगर किसी रिश्ते में आपकी वजह से परेशानी हुई है या आपने जानबूझकर या अनजाने में सामने वाले को ठेस पहुंचाई है, तो अहंकार छोड़कर माफी मांग लेना बेहतर है. अपनी गलती स्वीकार करना कमजोरी नहीं, बल्कि रिश्ते और अपनी जिम्मेदारी को समझने की निशानी है.

    हालांकि माफी केवल विवाद खत्म करने के लिए नहीं होनी चाहिए. अपनी गलती को समझना और उसे दोबारा न दोहराने की कोशिश करना भी उतना ही जरूरी है.

    रिश्ते को बचाने के लिए कभी-कभी झुकना भी जरूरी
    हर बहस में अपनी बात मनवाने की कोशिश रिश्तों में दूरी बढ़ा सकती है.  परिवार, दोस्ती या वैवाहिक रिश्तों में छोटी-छोटी बातों को लेकर लगातार बहस करने के बजाय कभी-कभी एक कदम पीछे हटना बेहतर होता है.  

    इसका मतलब यह नहीं है कि हर बार अपनी बात छोड़ दी जाए.  समझदारी यह है कि छोटी बातों और गंभीर मुद्दों के बीच अंतर किया जाए.  

    जब सामने वाला लगातार अपमान करे तो दूरी बनाएं
    किसी रिश्ते को बनाए रखने के नाम पर लगातार अपमान सहना सही नहीं है. अगर कोई व्यक्ति बार-बार आपकी भावनाओं को ठेस पहुंचाता है, आपकी बात को नजरअंदाज करता है या जानबूझकर आपको नीचा दिखाता है, तो ऐसी स्थिति में अपनी सीमाएं तय करना जरूरी है.  

    पहले शांत तरीके से अपनी बात स्पष्ट की जा सकती है.  अगर व्यवहार में लगातार कोई बदलाव नहीं आता, तो दूरी बनाना मानसिक शांति और आत्मसम्मान के लिए बेहतर विकल्प हो सकता है.  

    हर बात का जवाब देना जरूरी नहीं
    कई बार विवाद इसलिए बढ़ जाता है क्योंकि हम सामने वाले की हर बात का तुरंत जवाब देने लगते हैं.  चाणक्य नीति से जुड़ी शिक्षाओं में सही समय पर मौन रहने को भी समझदारी माना गया है.  

    अगर सामने वाला केवल बहस करना चाहता है और आपकी बात समझने के लिए तैयार नहीं है, तो ऐसे में शांत रहना बेहतर हो सकता है.  गुस्से में कही गई बातें बाद में रिश्ते को और नुकसान पहुंचा सकती हैं.  

    गलत लोगों से दूरी बनाना कमजोरी नहीं
    जीवन में हर व्यक्ति को खुश रखना संभव नहीं है.  कुछ लोग लगातार नकारात्मकता फैलाते हैं, दूसरों की आलोचना करते हैं या आपकी परेशानियों का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं.  ऐसे लोगों के साथ जरूरत से ज्यादा समय बिताने से मानसिक तनाव बढ़ सकता है.  

    इसलिए रिश्ते को केवल इसलिए बनाए रखना जरूरी नहीं कि वह पुराना है.  रिश्ते में सम्मान, भरोसा और पारस्परिक समझ भी जरूरी है.  

    माफी मांगते समय इन बातों का रखें ध्यान
    माफी मांगने का मतलब खुद को छोटा समझना नहीं है.  सच्ची माफी में अपनी गलती को स्वीकार करना, सामने वाले की भावनाओं को समझ कर भविष्य में गलती सुधारने की कोशिश करना शामिल है.  

    वहीं अगर आपने कोई गलती नहीं की है, तो केवल विवाद खत्म करने के लिए हर बार माफी मांगना भी उचित नहीं माना जा सकता.  ऐसी स्थिति में शांत तरीके से अपनी बात रखना ज्यादा बेहतर है.  

    आत्मसम्मान और अहंकार में अंतर समझें
    चाणक्य नीति की सबसे महत्वपूर्ण सीखों में से एक यह समझना भी है कि आत्मसम्मान और अहंकार एक चीज नहीं हैं.  अपनी गलती स्वीकार करना आत्मसम्मान को कम नहीं करता, जबकि बिना वजह हर जगह झुकते रहना आपके लिए नुकसानदायक हो सकता है.  

    इसी तरह अपनी बात पर कायम रहना हमेशा अहंकार नहीं होता.  फर्क इस बात से पड़ता है कि आप अपनी बात किस तरह रखें कि सामने वाले के सम्मान का ध्यान रखते हैं.  

    रिश्तों में इन बातों का रखें ध्यान
    किसी भी रिश्ते को मजबूत बनाए रखने के लिए केवल प्यार या भावनाएं काफी नहीं होतीं.  भरोसा, सम्मान, बातचीत और एक-दूसरे की सीमाओं को समझना भी जरूरी है.  मतभेद होने पर तुरंत रिश्ता खत्म करने के बजाय पहले बातचीत से समस्या सुलझाने की कोशिश करनी चाहिए.  

    लेकिन अगर किसी रिश्ते में लगातार अपमान, धोखा, मानसिक दबाव या सम्मान की कमी बनी हुई है, तो अपनी सीमाएं तय करना भी जरूरी है.  चाणक्य नीति की इन शिक्षाओं को आज के समय में इसी संतुलन के साथ समझा जा सकता है. 

  • शाही इमाम ईदगाह लखनऊ, मौलाना ख़ालिद रशीद फ़रंगी महली ने कहा

    शाही इमाम ईदगाह लखनऊ, मौलाना ख़ालिद रशीद फ़रंगी महली ने कहा

    शाही इमाम ईदगाह लखनऊ, मौलाना ख़ालिद रशीद फ़रंगी महली ने कहा

    सहारनपुर

    “सहारनपुर मस्जिद के ध्वस्तीकरण से संबंधित मामले में माननीय उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देश का हम स्वागत करते हैं। माननीय न्यायालय ने राज्य सरकार को इस मामले में अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है और मस्जिद के संबंध में लगाए गए जुर्माने पर भी रोक लगा दी है।

    हम इसे न्याय की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानते हैं और हमें उम्मीद है कि माननीय उच्च न्यायालय मस्जिद के अधिकारों की रक्षा करेगा तथा इस मामले में न्याय सुनिश्चित करेगा।

    हमें पूरा विश्वास है कि, इंशाअल्लाह, सहारनपुर मस्जिद का यथाशीघ्र पुनर्निर्माण होगा और अंततः न्याय की जीत होगी, क्योंकि धार्मिक स्थलों को Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 तथा वक्फ़ से संबंधित लागू कानूनी प्रावधानों, जिसमें वक्फ़ बाय यूज़र भी शामिल है, के तहत संरक्षण प्राप्त है।

    हमें उम्मीद है कि वर्तमान मामले में इन सभी कानूनी संरक्षणों को उचित रूप से ध्यान में रखा जाएगा और न्याय सुनिश्चित किया जाएगा।”