नई दिल्ली।
 
जदयू के एनडीए से अलग होने के बाद इस चर्चा को बल मिला है कि विपक्ष को 2024 के लोकसभा चुनावों के लिए एक चेहरा मिल गया है। इसके बाद नए सिरे से विपक्षी एकता की अटकलें तेज हुई हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद भी कह चुके हैं कि अगली बार थर्ड फ्रंट नहीं बल्कि मेन फ्रंट बनेगा। लेकिन क्या वास्तव में यह होगा? कहने-सुनने में विपक्षी एकता और विपक्ष के चेहरे की बात जितनी आसान लगती है, लेकिन डगर उतनी ही कठन है।

राजनीतिक जानकारों की मानें तो सिर्फ विपक्ष के पास चेहरा होना और विपक्ष का एकजुट होना ही एनडीए या मोदी को हराने के लिए काफी नहीं है। बल्कि, विपक्ष को इसके लिए जमीन पर कार्य करने की जरूरत है। विपक्षी दलों खासकर क्षेत्रीय दलों को जो विपक्ष को एकजुट करने के प्रयासों में जुटे हैं, उन्हें यह बात भी ध्यान रखनी चाहिए कि विधानसभा चुनावों में वे जीत जाते हैं लेकिन लोकसभा चुनावों में उनका प्रदर्शन खराब क्यों रहता है? राजनीतिक विशेषज्ञ अभय कुमार दुबे का कहना है कि लोकसभा चुनाव अभी काफी दूर है। अभी विपक्षी दलों को दावेदारी की बजाय वह कार्य करने चाहिए जो एक विपक्षी पार्टी को करने होते हैं। यानी, सरकार की खामियों को जनता के बीच ले जाएं। लेकिन वह सब करने की बजाय दावेदारी की जा रही है जिसका अभी कोई औचित्य नहीं है। मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों में चेहरा मिल जाने से चुनाव जीत लेना आसान नहीं होगा।
 
 दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर और राजद से जुड़े सुबोध मेहता कहते हैं कि निश्चित रूप से जदयू-राजद की जुगलबंद का असर देश की राजनीति पर पड़ेगा। लेकिन यह समझना होगा कि आम चुनाव दो उम्मीदवारों के बीच का चुनाव नहीं है। इसलिए इसकी तैयारी के लिए विपक्ष को अभी से अपनी रणनीति बनाकर काम करना होगा। वे कहते हैं कि पहले 2014 से पहले प्रधानमंत्री के चेहरे पर आम चुनाव केंद्रीत नहीं हुआ।

इसके अलावा विपक्षी एकता में और भी कई बुनियादी अड़चनें हैं। कांग्रेस कभी भी क्षेत्रीय दलों के पीछे नहीं खड़ी होगी। कई क्षेत्रीय दल स्थानीय राजनीति के चलते एक मंच पर नहीं आ सकते आदि। ये बुनियादी समस्याएं पहले से बनी हुई हैं और कोई हल इनका नजर नहीं आता है।