रायपुर

आउटडोर स्टेडियम बूढ़ापारा में शनिवार को दिव्य सत्संग जीने की कला प्रवचनमाला के षष्ठम प्रभात में राष्ट्रसंत महोपाध्याय श्रीललितप्रभ सागरजी महाराज ने बुरी आदतों को अच्छी आदतों में कैसे बदलें विषय पर कहा कि हमें कमियां निकालने वाले अपनी आंखों के चश्मे को बदलना होगा। अगर दुर्योधन बनकर देखोगे तो कमियां ही नजर आएंगी और यदि युधिष्ठिर बनकर देखोगे तो किसी में कमियां ही नजर नहीं आएंगी। नजारों को बदलने की नहीं, हमें अपने नजरिए को बदलने की जरूरत है। हम सभी यह संकल्प लें कि मैं आज से कभी किसी की कमी नहीं निकालूंगा, जब भी किसी को देखुंगा तो उसमें विशेषताएं देखुंगा। क्योंकि जो दूसरों में कमियां देखता है वह कमजोर हो जाता है और जो दूसरों में विशेषताएं देखता है वह विशिष्ट हो जाता है। अगर आपको किसी एक में कमी नजर आए तो उससे बात कीजिए, पर आपको हर एक में कमी नजर आए तो अपने-आपसे बात कीजिए।
संतप्रवर ने कहा कि आदमी के जीवन की सबसे बड़ी कमजोरी और विशेषता की पहचान है उसके जीवन में पलने वाला स्वभाव और आदत। आपकी सुंदर वस्तुओं की प्रशंसा करने वाला व्यक्ति आपकी नहीं बल्कि उस वस्तु को देने या दुकान में उपलब्ध कराने वाले की करता है, पर आपकी जबान, आपका स्वभाव-नेचर यदि अच्छे हैं तो इसमें तारीफ आपकी होती है। इतना ही नहीं आदमी अगर गोरा है तो गोरेपन में उसकी तारीफ नहीं है। चेहरे की सुंदरता में तारीफ उसके मॉं-बाप की होती है, पर स्वभाव यदि सुंदर है तो तारीफ आदमी की खुद की होती है। बिना पैसे-टके का ये सत्संग रूपी ंब्यूटी पार्लर आपके तन को नहीं, ये आपके मन को सुंदर बनाने के लिए है। तन को प्रभावित करती है, मन को प्रभावित करती है, अंतरमन की सुंदरता जन-जन को प्रभावित करती है। अपनों को प्रभावित करती है, गैरों को प्रभावित करती है। अंतरमन की सुंदरता पूरे जग को प्रभावित करती है। अगर आदमी का अंतरमन निर्मल-पवित्र और सुंदर है तो ये तय मान कर चलो, वो जहां जाएगा वहां राज करेगा।

संतश्री ने आगे कहा- परमात्मा ने हमें जो कुछ देना था, नौ महीने में देकर बाहर निकाल दिया। आंखें, कान, जबान, हाथ-पैर अंग-उपांग सब दे दिए। गजब की बात तो ये है कि परमात्मा को जो देना था, वह सब उन्होंने 9 माह में दे दिया, हमारे जिंदगी के केवल वे दो परसेंट काम होते हैं जो उुपर वाला केवल नौ महीने में दे देता है और 98 परसेंट काम वे होते हैं जिन्हें परमात्मा हम पर 90 साल के लिए छोड़ देता है। भगवान ने जबान, कान दिए पर तय हमें करना होगा कि उस जबान से हम क्या बोलते, कानों से क्या सुनते हैं। भगवान ने सब अंग हमें दिए पर तय हमें करना होगा कि उनसे हम क्या काम करते-कराते हैं। ये जिंदगी भगवान ने हमारे हाथ छोड़ दी है, अब यह तय स्वयं को करना है कि मैं अपनी सारी जिंदगी नैतिकता, पवित्रता के साथ जिउंगा। हर व्यक्ति के जीवन निर्माण में भाग्य से भी बढ़कर अगर किसी की भूमिका होती है तो वह है उसकी अपनी आदतों की।

संतश्री ने कहा कि आदमी की जैसी आदतें होती है, वैसा ही उसका भविष्य बनता है। वैसे ही उसके संस्कार, वैसी ही उसकी जबान होती है। आदतोंं के अनुरूप ही आदमी के पांव भी उसी ओर जाया करते हैं, इसीलिए अपनी आदतों के प्रति हमेशा सजग रहें। जैसे एक गंदी मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है, वैसे ही एक बुरी आदत हमारी पूरी जिंदगी को तहस-नहस कर देती है। तय हमें करना होगा कि हम अच्छी आदतों को अपनाएं या बुरी आदतों में पड़ जाएं। गुड बनने की प्रेरणा देते हुए संतश्री ने समझाया कि भगवान को अंग्रेजी में गॉड कहते हैं, जिसकी स्पेलिंग जीओडी है, यदि जीओडी को पलट कर बोलें तो वह डॉग बन जाया करता है। ऐसे ही अगर जिंदगी में आदमी गलत रास्ते पर चला जाए तो वह जीओडी-गॉड नहीं रहता, उल्टा होकर डीओजी हो जाया करता है। जिंदगी में गॉड बन पाएं कि न बन पाएं, पर यह तय मान कर चलो कि पचास दिन की यह प्रवचनमाला ये दावा जरूर करती है कि आपको जिंदगी में जीओओडी-गुड जरूर बना देगी।

संतश्री ने कहा कि हमारी अच्छी आदतें जीवन के विकास का द्वार भी खोलती हैं और हमारी गलत आदतें हमारे जीवन को नीचे भी लेकर जाती हैं। गलत आदतें जीवन में विध्वंस का कारण बन जाती हंै, जीवन को नकारने, जीवन को नेगेटिव बनाने का कारण बनती हैं। एक बात तय है कि जिन सीढि?ों से आदमी उुपर जाता है, नीचे उतरने के लिए भी वे ही सीढि?ां काम आती हैं, इसीलिए आदमी अपनी आदतों के प्रति हमेशा सजग रहे। 50 प्रतिशत हमारे जीवन का निर्माण हमारी आदतों से होता है, भाग्य की भूमिका तो बहुत कम होती है। जीवन निर्माण में भाग्य की भूमिका पिता की तरह है और आदतों की भूमिका मां की तरह। इसीलिए कहा जाता है- जैसा पिए पानी वैसी बोले वाणी, जैसा खाए अन्न-वैसा रहे मन, जैसा करेगा आहार वैसा करेगा व्यवहार, जैसी होगी संगत वैसी आएगी जीवन में रंगत। दिनभर अगर आदमी ने अगर प्याज-लहसुन खाया है तो शाम को डकारें इलायची-केसर की नहीं आने वाली। हमारी आदतें ज्यादातर संगत से प्रभावित होती हैं। जैसी आदमी की संगत होती है, वैसी ही उसकी रंगत हो जाया करती है।   

रविवार का प्रवचन क्रोध का अंत: कैसे करें तुरंत विषय पर
श्रीऋषभदेव मंदिर ट्रस्ट के अध्यक्ष विजय कांकरिया, कार्यकारी अध्यक्ष अभय भंसाली, ट्रस्टीगण राजेंद्र गोलछा व उज्जवल झाबक, दिव्य चातुर्मास समिति के अध्यक्ष तिलोकचंद बरडि?ा, महासचिव पारस पारख, प्रशांत तालेड़ा, अमित मुणोत ने संयुक्त जानकारी देते बताया कि राष्ट्रसंत जीने की कला-विशेष प्रवचनमाला के अंतर्गत रविवार को सुबह 8:45 बजे से क्रोध का अंत, कैसे करें तुरंत विषय पर पे्ररक प्रवचन देंगे।