मुंबई।
महाराष्ट्र की राजनीति में कल बड़ा उलटफेर हुआ। भारती जनता पार्टी (भाजपा) ने अपने फैसले से तमाम सियासी पंडितों को चौंका दिया। शिवसेना के बागी गुट के नेता एकनाथ शिंदे के हाथों में राज्य की बागडोर थमा दी। राजनीतिक विश्लेषक इसे भाजपा के मास्टर स्ट्रोक के तौर पर परिभाषित कर रहे हैं। वहीं, शिवसेना ने अपने मुखपत्र के जरिए शिंदे गुट पर निशाना साधा है। उन्होंने पूछा सत्ता तो पा ली, लेकिन अब आगे क्या।

सामना में शिवसेना:
महाराष्ट्र की राजनीति में एक सुनहरा पन्ना लिखा गया। मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने सर्वोच्च न्यायालय के पैâसले के बाद एक पल में मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया। वे भी कुछ समय रुक कर लोकतंत्र की जीत के लिए आंकड़ों का खेल खेल सकते थे। विश्वासमत प्रस्ताव के समय भी हंगामा खड़ा करके कुछ विधायकों को निलंबित करवाकर वे सरकार बचा सकते थे, परंतु उन्होंने वह मार्ग नहीं चुना और अपने शालीन स्वभाव के अनुरूप भूमिका अपनाई। ‘वर्षा’ बंगला तो उन्होंने पहले ही छोड़ दिया था। बंगला अपने पास ही रहे इसके लिए उन्होंने मिर्ची का हवन आदि वगैरह झमेला नहीं किया। उन्होंने सामान समेटा व ‘मातोश्री’ पहुंच गए। अब मुख्यमंत्री पद व विधान परिषद के विधायक का पद भी त्याग दिया। पूरे समय शिवसेना का कार्य करने के लिए वे मुक्त हो गए, ऐसा उन्होंने घोषित किया है। उद्धव ठाकरे ने जाते-जाते कहा, ‘मैं सभी का आभारी हूं, परंतु मेरे करीबी लोगों ने मुझे धोखा दिया।’ यह सही ही है। जिन्होंने दगाबाजी की वे करीब 24 लोग कल तक उद्धव ठाकरे की ‘जय-जयकार’ किया करते थे।

इसके आगे भी कुछ समय तक दूसरों के भजन में व्यस्त रहेंगे। पार्टी से बाहर निकलकर दगाबाजी करनेवाले विधायकों के खिलाफ दल-बदल कानून के तहत कार्रवाई शुरू करते ही सर्वोच्च न्यायालय ने उसे रोक दिया तथा दल-बदल कार्रवाई किए बगैर बहुमत परीक्षण करें, ऐसा कहा। राज्यपाल और न्यायालय ने सत्य को खूंटी में टांग दिया और निर्णय सुनाया। इसलिए विधि मंडल की दीवारों पर सिर फोड़ने में कोई अर्थ नहीं था। दल बदलनेवाले, पार्टी के आदेशों का उल्लंघन करनेवाले विधायकों की अपात्रता से संबंधित पैâसला आने तक सरकार को बहुमत सिद्ध करने के लिए कहना संविधान से परे है। परंतु संविधान के रक्षक ही ऐसे गैर कानूनी कृत्य करने लगते हैं और ‘रामशास्त्री’ कहलानेवाले न्याय के तराजू को झुकाने लगते हैं, तब किसके पास अपेक्षा से देखना चाहिए? इस तमाम पार्श्वभूमि में अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा कही गई दो बातें याद आती हैं।

अटल बिहारी की सरकार सिर्फ एक मत से गिरने के दौरान ही अटल बिहारी विचलित नहीं हुए। ‘तोड़-फोड़ करके हासिल किए गए बहुमत को मैं चिमटे से भी स्पर्श नहीं करूंगा’, ऐसा उन्होंने कहा ही। लेकिन उन्होंने आगे जो कहा उसे आज के भाजपाई नेताओं के लिए स्वीकार करना जरूरी है। उन्होंने लोकसभा के सभागृह में कहा, ‘मंडी सजी हुई थी, माल भी बिकने को तैयार था लेकिन हमने माल खरीदना पसंद नहीं किया!’ अटल जी की विरासत अब खत्म हो गई है। महाराष्ट्र के विधायकों को पहले सूरत ले गए। वहां से उन्हें असम पहुंचाया। अब वे गोवा आ गए हैं और उनका स्वागत भाजपावाले मुंबई में कर रहे हैं। देश की सीमा की रक्षा के लिए उपलब्ध हजारों जवान खास विमान से मुंबई हवाई अड्डे पर उतरे। इतना सख्त बंदोबस्त केंद्र सरकार कर रही है, तो किसके लिए? जिस पार्टी ने जन्म दिया उस पार्टी से, हिंदुत्व से, बालासाहेब ठाकरे से द्रोह करनेवाले विधायकों की रक्षा के लिए? हिंदुस्थान जैसे महान देश और इस महान देश का संविधान अब नैतिकता के पतन से ग्रसित हो गया है। ये परिस्थितियां निकट भविष्य में बदलेंगी ऐसे संकेत तो नजर नहीं आ रहे हैं क्योंकि बाजार में सभी रक्षक बिकने के लिए उपलब्ध हैं।

हमारी सद्-सद् विवेक बुद्धि बेहद ठंडी पड़ गई है। यह दर्द नहीं धोखा है। ज्यादातर लोगों को जिस तरह से आकाश में विहार करना नहीं जमता है, उसी तरह से विचार करना भी नहीं जमता है। लोगों को शॉर्टकट से सब कुछ हासिल करना है। असीमित सत्ता का और पाशवी बहुमत का प्रचंड दुरुपयोग हो रहा है। विरोधियों को हरसंभव मार्ग से परेशान नहीं, बल्कि प्रताड़ित करने का तंत्र तैयार हो गया है। योगी श्री अरविंद ने एक बार कहा था, ‘राजशाही के हाथ में अधिकाधिक अधिकार सौंपने की प्रवृत्ति फिलहाल इतनी प्रबल हो गई है कि इससे व्यक्ति की स्वतंत्रता और स्वयंस्फूर्त प्रयासों को स्थान ही नहीं मिलता है तथा यदि वह मिला तो भी इतना अपर्याप्त होता है कि अंतत: सत्तातंत्र के सामने व्यक्ति असहाय हो जाता है!’