नई दिल्ली।
 पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में हार के बाद कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उत्तर प्रदेश सहित सभी प्रदेश अध्यक्षों से इस्तीफे मांग लिए थे। इसके बाद अभी तक नए प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति नहीं हो पाई है। पार्टी जिस नेता से भी अध्यक्ष पद संभालने की बात करती है, वह साफ इनकार कर देता है। एक नेता के मुताबिक करीब आधा दर्जन नेता अब तक इनकार कर चुके हैं। क्योंकि, उन्हें प्रदेश में कांग्रेस के मजबूत होने की कोई उम्मीद नहीं दिखती। वहीं, अध्यक्ष बनकर वह भाजपा से सीधा मुकाबला नहीं चाहते। ऐसे में पार्टी परेशान है कि आखिर प्रदेश अध्यक्ष लाए तो कहां से लाए।

शिवसेना सांसदों पर निगाह
संसद सत्र के दौरान शिवसेना सांसदों पर सबकी निगाह रहेगी। अभी से विरोधी खेमे में अलग-अलग कयास लगाए जा रहे हैं। एनसीपी के एक नेता ने कहा कि एकनाथ शिंदे के संपर्क में जो सांसद हैं और जो सांसद उद्धव के साथ हैं उनकी अलग-अलग मुद्दों पर लाइन क्या होगी, यह देखना दिलचस्प रहेगा। हालांकि, कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष की बैठकों में शिवसेना को भी आमंत्रित किया जाएगा। लेकिन, संसद की रणनीति में शिवसेना के समर्थन को लेकर विरोधी खेमा आश्वस्त नहीं है। कहा जा रहा है कि जिस तरह से द्रौपदी मुर्मू को समर्थन के मुद्दे पर उद्धव दबाव में आए हैं। सत्र के दौरान भी यह दबाव नजर आ सकता है। फिलहाल क्या होगा, यह सत्र की बैठक के दौरान ही पता चलेगा। तब तक अटकलों का बाजार ही गर्म रहेगा।

 आलाकमान भी आजिज
बिहार के बयानवीर नेताओं से दिल्ली नेतृत्व त्रस्त है। सख्त ताकीद के बाद भी अपनी ही सरकार पर सवाल उछालने से बाज नहीं आ रहे। फायरब्रांड नेताजी जबसे दिल्ली में महत्वपूर्ण ओहदे पर विराजे हैं, सूबे के कई नेता आग उगलने में उनसे आगे निकलने की होड़ में हैं। बयानों से आलाकमान आजिज है। गठबंधन पर कोई आंच न आए, इसके लिए हाल में प्रधानजी को भेजा गया। मगर, उनकी सख्त नसीहत भी कुछ ही दिन असरदार रही। वहीं, अभी पहले की लपटें शांत भी नहीं हुई थीं कि नाराज साहब मीडिया में बयान देकर अंतर्ध्यान हो लिए। शीर्ष नेतृत्व चिंतित कि कहीं फिर न कुछ बयान दे दें। लेकिन, उनको समझाने-बुझाने का दांव भी बेकार जाता दिख रहा है।

दिल्ली की आस
उत्तर प्रदेश में पिछली सरकार में मंत्री रहे, लेकिन इस बार सत्ता से बाहर बैठे नेता अब दिल्ली से आस लगाए बैठे हैं। उनको लगता है कि अगले पांच साल तक योगी सरकार में शायद ही उनको जगह मिले। ऐसे में अगर दो साल बाद होने वाले लोकसभा चुनाव में मौका मिलता है तो ज्यादा फायदे का सौदा होगा। इसके अलावा केंद्रीय संगठन में काम करने का मौका भी भविष्य के लिए ज्यादा मुफीद होगा। दरअसल, बीते पांच साल तक सत्ता में रहने के बाद उनका मन केवल विधायक बनकर रहने में नहीं लग रहा है। इसलिए किसी न किसी जुगाड़ से दिल्ली आना चाहते हैं। दरअसल, दिल्ली की राजनीति ज्यादा भली है, जहां कम से कम केंद्रीय नेतृत्व के साथ मिलने-जुलने का मौका तो मिलता ही रहेगा। लेकिन, केंद्रीय नेतृत्व है कि एकदम चुप्पी साधे बैठा है और कोई संकेत तक नहीं दे रहा है।

तबादलों वाले मंत्री
तबादलों में मुश्किल होती है, लेकिन उत्तर प्रदेश के एक मंत्री आजकल तबादलों के कारण ही चर्चा में हैं। न सिर्फ चर्चा में हैं, बल्कि पार्टी में वाहवाही भी लूट रहे हैं। दरअसल, मंत्री जी पार्टी के पदाधिकारियों की तबादलों की सिफारिशों को न सिर्फ गंभीरता से लेते हैं, बल्कि रात-रात जगकर उन्हें फोन कर बताते हैं कि आपने फलां अधिकारी की फलां जगह तबादले की सिफारिश की है, उस पर प्रक्रिया शुरू कर दी है। सिफारिश करने वाला फूले नहीं समाता। इतना ही नहीं, अनेक पार्टीवालों की सिफारिशें परवान भी चढ़ी। जिनकी सिफारिश पूरी हुई, वे न सिर्फ मंत्री की शान में कसीदें पढ़ते हैं, बल्कि उन मंत्रियों को कोस भी रहे हैं, जो उनकी सिफारिशों पर ध्यान नहीं देते हैं।