वाराणसी
 गर्मी आते ही गंगा के घटते जलस्तर और घाटों के क्षरण की चिंता से हर कोई व्यथित है, लेकिन इससे कहीं ज्यादा पीड़ा है कि गंगाजल के जरिए बह रहे केमिकल घाटों के अस्तित्व मिटाने के कारक बन रहे हैं। फैक्ट्रियों से निकलने वाले विभिन्न रासायनिक पदार्थ बहाव के दबाव से कई गुना अधिक खतरा घाटों को पहुंचा रहे हैं। यह खुलासा आईआईटी बीएचयू के पूर्व निदेशक सिद्धनाथ उपाध्याय के अध्ययन में हुआ है। प्रो. उपाध्याय ने बताया कि गंगाजल के साथ बहकर केमिकल गंगा घाटों के पत्थरों को क्षति पहुंचा रहे हैं। उनकी वजह से पत्थरों के अंदर छोटे-छोटे छिद्र बन रहे हैं। ये छिद्र धीरे-धीरे बड़ा रूप ले लेते हैं।

इससे पत्थरों में दरार आ रही है और वह टूटकर गिर जाते हैं। इससे घाट खोखले हो रहे हैं। इस तरह की घटना बनारस के कई पक्के घाटों पर देखने को मिली है। प्रो. उपाध्याय ने बताया कि पक्के घाटों पर लगातार डिटर्जेंट के इस्तेमाल भी उन्हें बर्बाद करने का सबसे बड़ा कारण बन रहे हैं। उन्होंने कहा कि इसकी एक रिपोर्ट आईआईटी बीएचयू की ओर से शासन के नुमाइंदों को भेजी गई थी, लेकिन इस सम्बंध में कोई कार्रवाई नहीं हुई। उन्होंने सचेत किया समय रहते इन सब पर नियंत्रण नहीं किया गया तो पक्के घाट को बचा पाना मुश्किल होगा।

घाटों की मरम्मत कराए शासन-प्रशासन
प्रो. सिद्धनाथ उपाध्याय ने कहा कि घाटों को संरक्षित करने के लिए लगातार उनकी मरम्मत करानी होगी। उन्होंने बताया कि वर्षों पूर्व बने घाट की कभी मरम्मत नहीं की गई है। जिससे उनकी शक्ति क्षीण होती जा रही है। उन्होंने शासन-प्रशासन को सुझाव दिया है कि गर्मी में पानी कम होने के दौरान क्रम से थोड़े-थोड़े हिस्से में पानी को रोककर घाटों की मरम्मत भी करानी चाहिए।