नई दिल्ली
संविधान के अनुच्छेद 30(1) का हवाला देते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अगर एक बार अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान का प्रबंधन एक अल्पसंख्यक समुदाय के योग्य व्यक्ति को वाइस प्रिंसिपल या प्रिंसिपल के रूप में चुनने का निर्णय लेता है तो फिर अदालत इसकी तर्कसंगतता या औचित्य में हस्तक्षेप नहीं कर सकती है। न्यायमूर्ति चंद्रधारी सिंह की पीठ ने प्रत्येक भाषाई अल्पसंख्यक की अपनी सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक सीमाएं हो सकती हैं और उसे ऐसी संस्कृति और भाषा के संरक्षण का उन्हें संवैधानिक अधिकार है।

कोर्ट ने निरस्त की याचिका
प्रबंधन को पात्रता और योग्यता के आधार पर शिक्षकों को चुनने का भी अधिकार होगा। पीठ ने उक्त टिप्पणी करते हुए 19 दिसंबर 2013 को विभागीय प्रोन्नति समिति के कार्यवृत्त को चुनौती देने वाली याचिका को निरस्त कर दिया। याचिकाकर्ता बीरपाल सिंह ने सरकारी सहायता प्राप्त नूतन मराठी सीनियर सेकेंडरी स्कूल की वाइस प्रिंसिपल शुभदा बापट की नियुक्ति को चुनौती दी थी।

यह है मामला
याचिकाकर्ता को 15 जुलाई 1994 को स्कूल में पीजीटी (गणित) के पद के लिए चयन समिति द्वारा नियुक्त किया गया था। तत्कालीन वाइस-प्रिंसिपल के प्राचार्य के रूप में पदोन्नत होने पर 10 दिसम्बर 2009 को वाइस प्रिंसिपल का पद खाली हुआ था। दिसम्बर 2009 से मई 2011 तक उप प्राचार्य का पद रिक्त था।याचिकाकर्ता ने इस पद पर पदोन्नत करने के लिए स्कूल प्रबंधन को पत्र, अभ्यावेदन भेजा, लेकिन कोई निर्णय नहीं लिया गया।16 मई 2011 को शिक्षा निदेशालय ने स्कूल को पत्र भेजकर वाइस प्रिंसिपल के पद के लिए विभागीय पदोन्नति समिति (डीसीपी) की बैठक करने का निर्देश दिया था।

भर्ती नियम का नहीं किया गया पालन
जनवरी 2012 में याचिकाकर्ता ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर तीन साल तक डीपीसी न कराने को चुनौती दी थी। साथ ही मांग की कि स्कूल डीपीसी दस दिसंबर 2009 से करे, जब वाइस प्रिंसिपल का पद खाली हुआ था। 27 जनवरी 2012 को स्कूल ने डीपीसी बैठक में एक बीनू चौधरी के नाम की वाइस-प्रिंसिपल पद के लिए अनुशंसा की। हालांकि, भर्ती नियमों के अनुसार नहीं होने के कारण नियुक्ति को पूर्वव्यापी प्रभाव से निरस्त कर दिया गया था।

याची ने जूनियर होने की दी दलील
इस मामले को भी हाई कोर्ट में चुनौती दी थी। दोनों याचिकाओं को एक सामान्य निर्णय द्वारा निरस्त किया गया और स्कूल को नए सिरे से छह सप्ताह के अंदर डीपीसी करने का निर्देश दिया गया।उक्त निर्णय के खिलाफ दायर अपील भी वर्ष 2016 में खारिज कर दिया गया था और हाई कोर्ट के निर्णय के अनुसार नया डीसीपी आयोजित कर प्रबंधन ने बापट को वाइस प्रिंसिपल के रूप में नियुक्त किया गया। इस निर्णय से व्यथित याचिकाकर्ता ने इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी। याची ने दलील दी कि उनसे जूनियर होने के बावजूद भी स्कूल द्वारा बापट की नियुक्ति की गई।

स्कूल प्रबंधन ने किया भाषाई अल्पसंख्यक संस्थान होने का दावा
वहीं, स्कूल प्रबंधन ने तर्क दिया कि यह एक भाषाई अल्पसंख्यक संस्थान है और उसे नियुक्ति का अधिकार है। ऐसे में बापट बेहतर चयन हैं क्योंकि वे इसी समुदाय से आती हैं । याची ने कहा कि स्कूल अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है, क्योंकि यह सरकार से 95 प्रतिशत सहायता प्राप्त करता है। उन्होंने यह भी कहा कि स्कूल के पास भाषाई अल्पसंख्यक समुदाय नहीं है क्योंकि इसके पास अल्पसंख्यक शैक्षिक संस्थानों के लिए राष्ट्रीय आयोग अधिनियम (एनसीएमईआइ) की धारा-10 के तहत केंद्र सरकार द्वारा प्रदान किया गया अल्पसंख्यक दर्जा प्रमाण पत्र नहीं है, जो किसी भी शैक्षणिक संस्थान के लिए अल्पसंख्यक संस्थान की स्थिति का आनंद लेने के लिए एक आवश्यक तत्व है।अल्पसंख्यक समुदाय के योग्य व्यक्ति को प्रिंसिपल के रूप में चुनने का अधिकार